उज्जैन में बैरवा समाज का 105 साल पुराना ऐतिहासिक डोल चल समारोह; 12 किलो चांदी का डोल बना आकर्षण
उज्जैन में बैरवा समाज का 105 साल पुराना ऐतिहासिक डोल चल समारोह भव्यता से निकला। 12 किलो चांदी के डोल, 24 अखाड़ों और 16 झांकियों के दर्शन कर श्रद्धालुओं ने खोला उपवास।
उज्जैन। धार्मिक नगरी उज्जैन में बैरवा समाज की 105 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक और गौरवशाली परंपरा मंगलवार शाम 6 बजे से बुधवार तड़के 4 बजे तक पूरी भव्यता के साथ जीवंत हो उठी। डोल ग्यारस (जलझूलनी एकादशी) के पावन अवसर पर बैरवा समाज का भव्य डोल चल समारोह शहर के प्रमुख मार्गों से होकर निकला। धार्मिक आस्था, सामाजिक एकजुटता, शौर्य और मालवी सांस्कृतिक विरासत से सजा यह वृहद आयोजन समाज के समृद्ध इतिहास और अटूट श्रद्धा को प्रदर्शित करता नजर आया।
📜 सिंधिया राज परिवार के ताम्रपत्र से मिली थी ऐतिहासिक मान्यता: 105 वर्षों से अनवरत जारी है परंपरा
अखिल भारतीय बैरवा समाज के जिलाध्यक्ष सुरेंद्र मरमट ने बताया कि इस डोल चल समारोह का इतिहास करीब 105 वर्ष पुराना है।
तत्कालीन सिंधिया राजघराने के शासनकाल में समाज को डोल जुलूस निकालने की विधिवत अनुमति एक विशेष ताम्रपत्र के माध्यम से प्रदान की गई थी। यह ऐतिहासिक ताम्रपत्र आज भी बैरवा समाज की इस गौरवशाली परंपरा का मुख्य आधार और पहचान माना जाता है। समय के साथ आयोजन का स्वरूप लगातार विशाल और भव्य होता चला गया, लेकिन डोल निकालने की मूल सांस्कृतिक आत्मा आज भी अक्षुण्ण है।
🪙 12 किलो चांदी का डोल बना मुख्य आकर्षण: संपूर्ण समाज के सामूहिक सहयोग से हुआ निर्माण
समारोह के दौरान 12 किलोग्राम शुद्ध चांदी से निर्मित डोल श्रद्धालुओं के लिए विशेष दर्शन और आस्था का केंद्र रहा।
सुरेंद्र मरमट के अनुसार, यह डोल किसी एक धनाढ्य व्यक्ति के सहयोग से नहीं, बल्कि पूरे बैरवा समाज के अंशदान और सामूहिक प्रयास से तैयार किया गया है। शास्त्रों में चांदी को मानसिक शीतलता का प्रतीक माना गया है, इसलिए भगवान श्री कृष्ण के प्रति समर्पित इस डोल को समाज अपनी अनमोल आध्यात्मिक विरासत के रूप में पूजता है।
🛕 किशनपुरा मंदिर से शुरू होकर द्वारकाधीश गोपाल मंदिर पहुँचा जुलूस: पुष्प वर्षा से हुआ स्वागत
परंपरानुसार डोल का प्रथम पूजन शहर के किशनपुरा स्थित प्राचीन मंदिर में विधि-विधान से संपन्न किया गया।
इसके पश्चात जुलूस तीन बत्ती चौराहा, फ्रीगंज टावर, चामुंडा माता मंदिर, देवास गेट और मालीपुरा होते हुए प्रसिद्ध द्वारकाधीश गोपाल मंदिर पहुँचा। जहाँ भगवान श्री कृष्ण के दर्शन और विशेष महाआरती की गई। पूरे मार्ग में जगह-जगह शहरवासियों ने डोल और झांकियों पर पुष्प वर्षा कर उनका भव्य स्वागत किया।
⚔️ 24 अखाड़ों में दिखा युवाओं का शौर्य, 16 झांकियों और 10 रास मंडलों ने बिखेरी भक्ति की छटा
इस वर्ष डोल चल समारोह में 24 पारंपरिक अखाड़े और 16 भव्य झांकियां शामिल हुईं।
अखाड़ों के खलीफाओं के मार्गदर्शन में युवाओं और बच्चों ने हैरत अंगेज पारंपरिक शस्त्रकला व लाठी-तलवारबाजी का प्रदर्शन किया। वहीं, 16 झांकियां मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण के जीवन और भक्ति प्रसंगों पर आधारित थीं। इसके अतिरिक्त 10 रास मंडलों के कलाकारों ने कृष्ण-राधा की मनमोहक रासलीलाओं का सजीव मंचन कर श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
🌺 राधा-कृष्ण मंदिरों से जुड़ी है समाज की जड़ें: डोल के दर्शन के बाद ही उपवास खोलते हैं श्रद्धालु
अखिल भारतीय बैरवा महासभा के प्रदेश अध्यक्ष राजेश जारवाल ने बताया कि बैरवा समाज का धार्मिक इतिहास शुरू से ही राधा-कृष्ण भक्ति से जुड़ा रहा है।
प्रारंभ में शहर में समाज के 17 से 18 मोहल्ले हुआ करते थे, जो अब बढ़कर 26 से 28 हो चुके हैं और हर मोहल्ले में प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर स्थित हैं। डोल ग्यारस पर समाज की महिलाएं व श्रद्धालु निर्जला उपवास रखते हैं और रात्रि में डोल तथा भगवान श्री कृष्ण के दर्शन व पूजन के उपरांत ही अपना व्रत खोलते हैं।
⏱️ समयबद्धता के लिए विशेष पहल: समय पर निकलने वाले अखाड़ों को ₹5,000 की प्रोत्साहन राशि
समारोह को सुचारू और समयबद्ध बनाने के लिए अखिल भारतीय बैरवा महासभा द्वारा इस बार एक अनुकरणीय पहल की गई।
आयोजकों द्वारा घोषित नियम के तहत चामुंडा माता मंदिर चौराहे से रात्रि 10:30 बजे तक समय सीमा में आगे बढ़ने वाले प्रत्येक अखाड़े और झांकी दल को समाज की ओर से ₹5,000 की प्रोत्साहन नगद राशि देकर सम्मानित किया गया, जिससे पूरे जुलूस की गतिशीलता बनी रही।
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