1843 में महारानी बैजाबाई ने बनवाया था यह ऐतिहासिक मंदिर, जन्माष्टमी पर उमड़ती है डेढ़ लाख भक्तों की भीड़

ग्वालियर के ऐतिहासिक गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी पर 120 करोड़ रुपये से अधिक के बेशकीमती गहनों से राधा-कृष्ण का श्रृंगार किया जाएगा। बैंक लॉकर से कड़े पहरे में आए आभूषण।

Sep 04, 2026 - 15:10
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1843 में महारानी बैजाबाई ने बनवाया था यह ऐतिहासिक मंदिर, जन्माष्टमी पर उमड़ती है डेढ़ लाख भक्तों की भीड़

मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में स्थित प्रसिद्ध और ऐतिहासिक गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी का पर्व बेहद राजसी वैभव के साथ मनाया जाता है। क्या आप जानते हैं कि यहाँ भगवान राधा-कृष्ण का श्रृंगार आम फूलों या सामान्य गहनों से नहीं, बल्कि एक अरब (120 करोड़ रुपए) से ज्यादा कीमत के बेशकीमती आभूषणों से होता है? सोना, हीरा, पन्ना और मोतियों से जड़े ये प्राचीन और दुर्लभ आभूषण साल में केवल एक बार जन्माष्टमी के इसी पावन मौके पर बैंक के सुरक्षित लॉकर से बाहर लाए जाते हैं।

🏦 सेंट्रल बैंक के लॉकर से कड़ी सुरक्षा में लाए जाते हैं आभूषण, दर्शन के लिए उमड़ती है डेढ़ लाख भक्तों की भीड़

शुक्रवार को गोपालजी मंदिर में विराजे भगवान राधा-कृष्ण के इस भव्य श्रृंगार के लिए सुबह करीब 10 बजे प्रशासनिक और नगर निगम की समिति सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पहुँचती है। भारी पुलिस सुरक्षा और कड़े पहरे के बीच बैंक लॉकर से इन आभूषणों को निकाला जाता है। मंदिर पहुँचने के बाद इनकी साफ-सफाई की जाती है और फिर विधि-विधान से भगवान का अलौकिक श्रृंगार किया जाता है। इस बार भी जन्माष्टमी के इस दुर्लभ अवसर पर गोपालजी के दर्शन करने के लिए लगभग डेढ़ लाख श्रद्धालुओं के पहुँचने की संभावना है, जिसे लेकर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।

💎 सिंधिया राजवंश की महारानी बैजाबाई ने 1843 में कराई थी स्थापना, मुकुट में जड़े हैं कीमती रत्न

मंदिर के पुजारी फक्कड़ बाबा के अनुसार, राधा-कृष्ण के ये गहने सदियों पुरानी शाही विरासत का अहम हिस्सा हैं। भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में पुखराज, माणिक और पन्ना जैसे अत्यंत कीमती रत्न जड़े हैं। इसके अलावा, सात लड़ियों वाले खास हार में 62 असली मोती और 55 पन्ने जड़े हैं, जिसकी कीमत ही अकेले लगभग 35 करोड़ रुपए आंकी जाती है। रत्नजड़ित मुख्य मुकुट की कीमत करीब 25 करोड़ और सोने के मुकुट की कीमत सवा करोड़ रुपए से अधिक है, जबकि राधारानी का तीन तोला वजन का रत्नजड़ित मुकुट भी मुख्य आकर्षण का केंद्र रहता है। सन 1843 में सिंधिया राजवंश की महारानी बैजाबाई द्वारा बनवाए गए इस सफेद संगमरमर के मंदिर के गर्भगृह के चांदी से मढ़े दरवाजे इसकी गौरवशाली विरासत की आज भी गवाही देते हैं।

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