नर्मदापुरम में आचार्य श्री समेत 5 मुनिराजों ने किया कठिन 'केशलोंच' व्रत, गुरुभक्ति में उमड़े हजारों श्रद्धालु
नर्मदापुरम के महावीर परिसर में जैन आचार्य 108 समयसागर महाराज का चातुर्मास प्रवचन हुआ। मुनि संघ ने केशलोंच कर उपवास रखा। पढ़ें गुरुदेव का आध्यात्मिक संदेश।
नर्मदापुरम। शहर की न्यास कॉलोनी में स्थित महावीर परिसर में पावन वर्षा योग (चातुर्मास) के पावन अवसर पर भव्य प्रवचन माला का आयोजन किया गया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन धर्म के सर्वमान्य आचार्य 108 समयसागर महाराज ने मर्मस्पर्शी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि समय का चक्र निरंतर गतिमान है, यह कभी किसी के लिए रुकता नहीं है। मनुष्य का यह दुर्लभ जीवन किसी सांसारिक वैभव के लिए नहीं, बल्कि साधना, धर्म-ध्यान और आत्मकल्याण के लिए मिला है। जब जीव मोह-माया का त्याग कर आत्मिक शुद्धि करता है और उसकी मोक्ष की वास्तविक यात्रा शुरू होती है, तो फिर वहां से संसार में लौटना नहीं होता। इसके विपरीत, संसारी जीव अज्ञानता व मोहवश जन्म-मरण के अंतहीन चक्र में लगातार परिभ्रमण करता रहता है।
🚶 पैदल विहार की यात्रा: श्रद्धालुओं और आर्यिका संघ की भावनाओं का सम्मान कर नर्मदापुरम पहुंचे मुनिराज
सोमवार को चातुर्मास के दौरान आयोजित विशेष प्रवचन में पूज्य आचार्य श्री ने अपने पूर्व वर्षायोग और विहार (पदयात्रा) संस्मरणों को साझा किया। उन्होंने बताया, "पिछले वर्ष मुझे संस्कारधानी जबलपुर में वर्षायोग संपन्न करने का पुण्य अवसर मिला था। वहां से मुनि संघ सहित मंगल विहार करते हुए हमने मुक्तागिरि सिद्ध क्षेत्र की वंदना की। तत्पश्चात हमारा संघ नागपुर पहुंचा, जहां भीषण ग्रीष्मकालीन समय को हमने आत्म-स्वाध्याय और वैराग्य साधना में व्यतीत किया। इसके बाद मुनि संघ का विहार इटारसी-नर्मदापुरम क्षेत्र की ओर हुआ।" आचार्य श्री ने आगे कहा कि बैतूल से आगे जाने का मार्ग बिल्कुल सीधा और सुगम था, लेकिन इटारसी के आकुल-व्याकुल श्रावकों और यहां पहले से वर्षायोग कर रहे पूज्य आर्यिका संघ की तीव्र भक्ति और भावनाओं का सम्मान करते हुए मुनि संघ ने पैदल विहार कर यहां आने का निर्णय लिया।
✨ गुरुदेव की पावन स्मृति: कलिकाल में आचार्य विद्यासागर महाराज का तप अद्वितीय, भीड़ में 'नीड़' को न भूलें
अपने प्रवचन में आचार्य समयसागर महाराज ने साधना के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि चातुर्मास के ये 4 महीने आत्मचिंतन, संयम और तपस्या के लिए सर्वोपरि होते हैं। कलिकाल (वर्तमान युग) में परम पूज्य राष्ट्रसंत आचार्य 108 विद्यासागर महाराज ने जो कठिन तप, अद्वितीय त्याग और आध्यात्मिक साधना की, वह न केवल जैन समाज बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए युगों-युगों तक प्रेरणा का अटूट स्रोत बनी रहेगी। उन्होंने अपने गुरुदेव को भावुक मन से याद करते हुए कहा, "मुझे गुरुदेव का लंबे समय तक अत्यंत निकटतम सान्निध्य प्राप्त हुआ। भले ही वे आज भौतिक रूप से हमारे बीच विद्यमान नहीं हैं, लेकिन हर सच्चे श्रद्धालु के हृदय में उनका स्थान आज भी वैसा ही अक्षुण्ण बना हुआ है। गुरुदेव अक्सर कहते थे कि साधना के समय बड़ी संख्या में भीड़ एकत्रित होती है और समय बीतने पर चली जाती है, लेकिन साधक को भीड़ के कोलाहल में रहते हुए भी अपने 'नीड़' अर्थात अपने मूल आत्मस्वरूप को कभी ओझल नहीं होने देना चाहिए।"
📿 केशलोंच और कठिन उपवास: आचार्य श्री और 5 मुनिराजों ने की उग्र साधना, गोधूलि बेला में उमड़ा जनसैलाब
आचार्य श्री ने परिभ्रमण (भटकाव) और मोक्ष यात्रा का मूलभूत अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि संसारी प्राणी संसार के क्षणभंगुर संबंधों के मोह के कारण भटकता है, जबकि मुक्ति का मार्ग तभी प्रशस्त होता है जब मोह पर पूर्ण विजय प्राप्त कर आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर लेती है। साधना की यह अग्नि तब तक निरंतर जलती रहनी चाहिए, जब तक साध्य (मोक्ष) की अंतिम प्राप्ति न हो जाए। चूंकि मनुष्य जीवन अत्यंत सीमित है, इसलिए इसके प्रत्येक क्षण का सदुपयोग जिनभक्ति और आत्मकल्याण में करना श्रेयस्कर है।
इसी कठिन साधना क्रम में सोमवार को परम पूज्य आचार्य समयसागर महाराज सहित संघ के 5 तपस्वी मुनिराजों ने अपने हाथों से बालों का उखाड़न (केशलोंच) कर पूर्ण उपवास (व्रत) धारण किया। जैन मुनियों की इस कठिन चर्या को साक्षात देखने बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। शाम को गोधूलि बेला में संगीतमय महाआरती और गुरुभक्ति का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें संपूर्ण नर्मदापुरम और आसपास के अंचलों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर पुण्य लाभ अर्जित किया।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)