28 करोड़ की लागत से निखरेगा ऐतिहासिक शनिश्चरा मंदिर, बदलेंगी प्रवेश, पार्किंग और भोजनशाला की व्यवस्थाएं

मुरैना के ऐतिहासिक शनिश्चरा मंदिर को धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। पर्यटन विकास निगम 28.43 करोड़ रुपये से मंदिर का कायाकल्प करेगा।

Oct 15, 2026 - 11:06
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28 करोड़ की लागत से निखरेगा ऐतिहासिक शनिश्चरा मंदिर, बदलेंगी प्रवेश, पार्किंग और भोजनशाला की व्यवस्थाएं

ग्वालियर। चंबल अंचल के मुरैना जिले में स्थित देश के सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक शनिश्चरा मंदिर को भव्य धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। मंदिर परिसर के सुंदरीकरण, विकास कार्यों और कायाकल्प पर कुल 28.43 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम ने मंदिर परिसर में नागरिक सुविधाओं के विस्तार, स्थल विकास तथा आंतरिक और बाहरी विद्युतीकरण के कार्यों के लिए टेंडर जारी कर दिया है। इन सभी विकास कार्यों को 18 महीने की समय सीमा के भीतर पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

🚗 नया मास्टर प्लान तैयार: प्रवेश, निकास और पार्किंग की बदलेंगी व्यवस्थाएं, बनेगा सत्संग हॉल और भोजनशाला

पर्यटन विकास निगम के कार्यपालन यंत्री अनिल कुमार पाटीदार ने बताया कि श्रद्धालुओं की सुलभ आवाजाही और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मंदिर परिसर के लिए एक विशेष मास्टर प्लान तैयार किया जा रहा है। इसके तहत मंदिर में प्रवेश और निकास द्वार की व्यवस्था पूरी तरह बदली जाएगी। परिसर में एक भव्य भोजनशाला और विशाल सत्संग हॉल का निर्माण किया जाएगा, जहां श्रद्धालु भजन-कीर्तन कर सकेंगे। साथ ही, वाहनों की पार्किंग व्यवस्था को व्यवस्थित और आधुनिक स्वरूप दिया जाएगा ताकि शनिचरी अमावस्या और मेलों के दौरान जाम की स्थिति न बने।

📜 त्रेतायुग से जुड़ा है ऐतिहासिक महत्व: सम्राट विक्रमादित्य ने कराई थी तांत्रिक रूप में मूर्ति की स्थापना

मुरैना के ऐंती गांव स्थित शनिश्चरा मंदिर को देश का सबसे प्राचीन शनि मंदिर माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में हनुमान जी ने शनिदेव को रावण के सिंहासन के नीचे से कैद मुक्त कराया था। तब कमजोर होने के कारण शनिदेव लंका से ऐंती पर्वत पर आ गिरे थे और यहीं तपस्या कर अपनी शक्तियां पुनः प्राप्त की थीं। बाद में राजा सम्राट विक्रमादित्य ने यहां जनेऊ, नीलमणि, रुद्राक्ष माला, सुमिरनी और दंड धारण किए हुए शनिदेव की दुर्लभ तांत्रिक मूर्ति स्थापित कराई थी। मान्यता है कि महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर की शिला भी इसी पवित्र स्थल से ले जाई गई थी।

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