कान्हा नेशनल पार्क के कोर जोन में खैरमाता का मंदिर, 35 सालों से घने जंगल में अकेले पूजा कर रहे रिटायर्ड वनकर्मी

कान्हा नेशनल पार्क के कोर जोन सूपखार में रिटायर्ड वनकर्मी रामकृष्ण पिछले 35 सालों से घने जंगलों के बीच अकेले खैरमाता की पूजा कर रहे हैं। जानें इस मंदिर की अनोखी कहानी।

Oct 16, 2026 - 19:26
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कान्हा नेशनल पार्क के कोर जोन में खैरमाता का मंदिर, 35 सालों से घने जंगल में अकेले पूजा कर रहे रिटायर्ड वनकर्मी

बालाघाट। मध्य प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क के सूपखार वन परिक्षेत्र में घने जंगलों के बीच माता का एक अत्यंत प्राचीन और चमत्कारी मंदिर स्थित है। बेहद घने जंगल और कोर जोन में होने के कारण आम पर्यटकों व श्रद्धालुओं की यहाँ आवाजाही पूरी तरह प्रतिबंधित रहती है। लेकिन हर नवरात्रि के मौके पर यहाँ माता के एक परम भक्त अकेले पहुँचते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। यह भक्त कोई और नहीं बल्कि पार्क के रिटायर्ड वनकर्मी रामकृष्ण हैं, जो सरकारी सेवा से मुक्त होने के बाद भी पिछले 35 सालों से अनवरत घने जंगलों के बीच आकर माता की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं।

🛖 1972 में विस्थापित हुआ था सूपखार गांव, मिट गए मकान और खेत; लेकिन आज भी कायम है खैरमाता की आस्था

इतिहास के अनुसार, कान्हा नेशनल पार्क के इस सूपखार क्षेत्र में पहले 'सूपखार' नाम का एक समृद्ध गांव हुआ करता था, जहाँ आदिवासी गोंड, परधान और पनका समाज के लोग निवास करते थे। वर्ष 1972 में जब कान्हा नेशनल पार्क का निर्माण हुआ, तब इस गांव को टाइगर रिजर्व की जद में आने के कारण सरकार द्वारा दूसरी जगह विस्थापित कर दिया गया। गांव उजड़ गया, खेत और इंसानी बसाहट की निशानियां वक्त के साथ मिट गईं, लेकिन गांव के रक्षक के रूप में पूजा जाने वाला 'खैरमाता' का मंदिर आज भी पुरानी यादों को समेटे पूरी शान से खड़ा है। तत्कालीन ग्रामीण गांव को हर संकट से बचाने और सुख-शांति के लिए इसी खैरमाता की आराधना करते थे।

🌿 बाघों की दहाड़ के बीच 9 दिनों की निर्जला साधना, रिटायर्ड वन चौकीदार बोले- 'माता की कृपा से नहीं लगता डर'

वर्ष 2017 में वन चौकीदार के पद से सेवानिवृत्त हुए वृद्ध रामकृष्ण बताते हैं कि उन्होंने यहाँ 26 वर्षों तक अपनी सेवा दी है। रिटायरमेंट के बावजूद वे शारदीय और चैत्र दोनों नवरात्रि में अकेले इस वीरान जंगल में पहुँचते हैं और पूरे 9 दिनों तक माता के दरबार में रहते हैं। वे बताते हैं कि यहाँ से अक्सर बाघ और अन्य हिंसक वन्यजीव गुजरते हैं, लेकिन माता के आशीर्वाद से आज तक उन्हें किसी जीव ने कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। वे इसे माता रानी का साक्षात चमत्कार मानते हैं और जीवन की अंतिम सांस तक इस सेवा भाव को जारी रखने का संकल्प रखते हैं।

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