विदिशा के ऐतिहासिक देवी का बाग मंदिर का है मराठा इतिहास से नाता, नाना साहब पेशवा के काल में हुई थी स्थापना

विदिशा के ऐतिहासिक देवी का बाग मंदिर का मराठा काल से है गहरा नाता। नाना साहब पेशवा द्वारा स्थापित मंदिर में मन्नत पूरी होने पर चढ़ती हैं घंटियां।

Oct 19, 2026 - 13:08
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विदिशा के ऐतिहासिक देवी का बाग मंदिर का है मराठा इतिहास से नाता, नाना साहब पेशवा के काल में हुई थी स्थापना

विदिशा। मध्य प्रदेश के विदिशा में स्थित ऐतिहासिक एवं प्राचीन 'देवी का बाग' मंदिर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और चमत्कारी मान्यताओं के लिए देश-विदेश तक प्रसिद्ध है। भोपाल से लगभग 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस प्राचीन मंदिर का इतिहास त्रेता युग में भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न के पुत्र सुबाहु की राजधानी से जुड़ा हुआ माना जाता है। समय के साथ इस क्षेत्र पर मौर्य, शुंग, गुप्त काल और परमार राजपूतों का शासन रहा है। मराठा साम्राज्य के दौरान 18वीं शताब्दी में पुणे के पेशवाओं के कार्यकाल (नाना साहब पेशवा, श्रीमंत बालाजी बाजीराव) के समय यहां कोल्हापुर की प्रसिद्ध देवी महालक्ष्मी की प्रतिमा की स्थापना की गई थी, और वर्तमान में यह मंदिर जोहरी परिवार द्वारा संरक्षित है।

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मंदिर की सेवा से जुड़ी स्थानीय महिला लक्ष्मी चतुर्वेदी बताती हैं कि उनका परिवार चार पीढ़ियों से इस मंदिर की पूजा-अर्चना संभाल रहा है। पहले यह पूरा इलाका एक घने जंगल की तरह था और यहां शेरों का आना-जाना भी हुआ करता था, लेकिन आज यह क्षेत्र घनी कॉलोनियों से घिर चुका है। इतिहासकार गोविंद के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण लगभग 1740 से 1761 के बीच नाना साहब पेशवा के काल में हुआ था। किवदंती है कि पानीपत के तीसरे युद्ध (1761) के दौरान जब नाना साहब पेशवा ने हजारों सैनिकों के साथ विदिशा क्षेत्र में पड़ाव डाला था, तभी नीम के पेड़ की छांव में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई थी, जिसे आज 'देवी का बाग' के नाम से जाना जाता है।

🔔 मनोकामनाएं पूरी होने परभक्त चढ़ाते हैं घंटियां: माता के आदेश पर शत-चंडी यज्ञ के बाद पूरा हुआ मंदिर का भव्य नवनिर्माण

इस मंदिर की खास मान्यता यह है कि यहां सच्चे मन से आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है, जिसके बाद श्रद्धालु मंदिर में घंटियां अर्पित करते हैं। मंदिर समिति प्रमुख प्रवीण जौहरी ने बताया कि वर्ष 2019 में जब मंदिर के जीर्णोद्धार का प्रयास किया गया, तो दीवारें और छत अपने आप गिर जाती थीं। इसके बाद माता के स्वप्निल आदेशानुसार शत-चंडी यज्ञ किया गया, जिसके फलस्वरूप निर्माण कार्य बिना किसी बाधा के पूरा हुआ। इस मंदिर में हनुमान जी, वीर भैया, हरदोल लाला, गणेश, दूल्हा देव, शिवलिंग, भैरव बाबा और विष्णु जी की मूर्तियां भी स्थापित हैं, जो इसे विभिन्न आस्थाओं का एक प्रमुख केंद्र बनाती हैं।

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