निर्भया कांड के बाद बसों-टैक्सियों में लगा पैनिक बटन कितना सेफ? जानिए जबलपुर की जमीनी हकीकत

जबलपुर में टैक्सियों में लगे पैनिक बटन की जमीनी हकीकत आई सामने। थाने के सामने बटन दबाने पर भी 1 घंटे तक नहीं पहुंची मदद, ड्राइवरों का दावा—2 दिन बाद आता है रिस्पॉन्स।

Sep 22, 2026 - 16:23
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निर्भया कांड के बाद बसों-टैक्सियों में लगा पैनिक बटन कितना सेफ? जानिए जबलपुर की जमीनी हकीकत

जबलपुर। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठे थे। इसके बाद देशभर में टैक्सी और बसों में पैनिक बटन और व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम (VLTD) लगाने की व्यवस्था शुरू की गई थी।

इसका मुख्य उद्देश्य था कि आपात स्थिति में यात्री पैनिक बटन दबाए और उसकी लाइव लोकेशन तत्काल पुलिस कंट्रोल रूम तक पहुंचे, ताकि समय रहते मदद मिल सके। लेकिन जबलपुर में इस सुरक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

⏱️ पुलिस थाने के ठीक सामने दबाया पैनिक बटन, 1 घंटे बाद भी नहीं आया कोई रिस्पॉन्स

जब एक जागरूक महिला ने मालवीय चौक स्थित पुलिस थाने के ठीक सामने टैक्सी में पैनिक बटन दबाकर इस व्यवस्था को परखने की कोशिश की, तो उनका दावा है कि बटन दबाने के बाद करीब एक घंटे तक मौके पर इंतजार करने के बावजूद कोई मदद या रिस्पॉन्स नहीं मिला।

महिला का कहना है, "अगर वास्तव में कोई महिला या यात्री किसी गंभीर खतरे में हो और पैनिक बटन दबाने के बाद भी मदद पहुंचने में इतना समय लग जाए तो उसकी जान भी जा सकती है।" उनका सवाल है कि आपात स्थिति में यात्रियों की सुरक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी है?

📱 पैनिक बटन दबाने के 2 दिन बाद आता है मैसेज: सिस्टम टेस्ट करने वाले चालकों का खुलासा

इसके बाद ईटीवी भारत के संवाददाता ने टैक्सी संचालक संतोष की गाड़ी में बैठकर पैनिक बटन दबाकर प्रत्यक्ष परीक्षण किया। गाड़ी में पैनिक बटन और पूरा ट्रैकिंग सिस्टम मौजूद था, लेकिन बटन दबाने के तत्काल बाद कोई रिस्पॉन्स नहीं मिला।

टैक्सी संचालक संतोष का कहना है, "वह कई बार सिस्टम को चेक करने के लिए पैनिक बटन दबा चुके हैं। कई बार 2 दिन बाद मैसेज या फोन आता है, जिसमें पूछा जाता है कि आपकी टैक्सी से पैनिक बटन क्यों दबाया गया था।" संतोष का कहना है कि जिस सिस्टम का उद्देश्य आपात स्थिति में तत्काल मदद पहुंचाना है, अगर उसका रिस्पॉन्स ही 2 दिन बाद मिले तो इसका फायदा ड्राइवर और यात्री किसी को नहीं है।

💸 पैनिक बटन न हो तो परमिट और फिटनेस में पेंच: ₹12,000 खर्च के बाद भी सिस्टम बेअसर

टैक्सी कारोबारी मनीष गुप्ता का कहना है, "वाहनों में पैनिक बटन लगाना अनिवार्य है। अगर वाहन में निर्धारित सिस्टम नहीं है तो आरटीओ से परमिट और फिटनेस की प्रक्रिया में परेशानी आती है। पैनिक बटन और संबंधित डिवाइस लगवाने में करीब ₹12,000 तक का खर्च आता है। निजी एजेंसियों के माध्यम से यह सिस्टम लगाया जा रहा है और इस प्रक्रिया में करीब 15 दिन तक का समय लगता है। इस दौरान टैक्सी खड़ी रहने से वाहन मालिक को रोजाना की कमाई का भारी नुकसान होता है।"

टैक्सी संचालकों का यह भी कहना है कि हर साल सिस्टम के नवीनीकरण (Renewal) के नाम पर करीब ₹9,000 तक अलग से खर्च करने पड़ते हैं। उन्हें हर महीने वाहन की किस्त जमा करनी होती है, ऐसे में 15 दिन तक वाहन खड़ा रहने और इस मेंटेनेंस खर्च का सीधा असर उनके कारोबार पर पड़ता है।

🏛️ आरटीओ बोलीं—कानून में अनिवार्य है व्यवस्था: शिकायत मिलने पर कराई जाएगी जांच

जबलपुर की आरटीओ (RTO) रिंकू शर्मा के मुताबिक, "टैक्सी वाहनों में पैनिक बटन और संबंधित सुरक्षा व्यवस्था कानून के तहत पूरी तरह अनिवार्य है। इसके बिना किसी भी टैक्सी का परमिट जारी नहीं किया जा सकता। पैनिक बटन का केंद्रीय कंट्रोल रूम भोपाल में स्थित है। बटन दबाने पर व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस के माध्यम से वाहन की लोकेशन पता चलने और संबंधित नजदीकी पुलिस स्टेशन को अलर्ट भेजने का प्रावधान है।"

उन्होंने आगे कहा कि पैनिक बटन काम न करने की कोई लिखित शिकायत अभी तक उनके संज्ञान में नहीं आई है। यदि किसी वाहन मालिक या यात्री को इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ा है तो वह लिखित शिकायत दर्ज करा सकता है, जिस पर जांच कराई जाएगी।

❓ बड़ा सवाल: यात्रियों की सुरक्षा का दावा, फिर पैनिक बटन से असली फायदा किसे?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर पैनिक बटन लगाना अनिवार्य है और उसके लिए वाहन मालिकों से भारी-भरकम राशि भी वसूली जा रही है, लेकिन फिर भी आपात स्थिति में बटन दबाने पर समय पर मदद नहीं पहुंचती, तो इस पूरी व्यवस्था की जवाबदेही किसकी है?

इस पैनिक बटन का फायदा न तो उन महिलाओं और यात्रियों को मिल रहा है जिनकी सुरक्षा के लिए इसे लागू किया गया था, और न ही उन टैक्सी मालिकों को जो हर साल हजारों रुपये खर्च कर रहे हैं। इस पूरी व्यवस्था का आर्थिक फायदा केवल उन निजी एजेंसियों को हो रहा है जो ₹12,000 में डिवाइस बेच रही हैं और हर साल मेंटेनेंस के नाम पर मोटी रकम वसूल रही हैं।

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