मांडू के पास जंगल में दफन है इतिहास का अनमोल अध्याय, संरक्षण के अभाव में विलुप्त हो रही 'बूढ़ी मांडू' की धरोहर
धार जिले के मांडू के पास स्थित प्राचीन 'बूढ़ी मांडू' अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। दुर्लभ मूर्तियों और मंदिरों के संरक्षण के लिए सरकार से गुहार।
धार। मांडू से करीब चार किलोमीटर दूर सोडपुर के घने जंगलों में इतिहास का एक ऐसा अद्भुत अध्याय दफन है, जो आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहा है। विंध्य पर्वतमाला की करीब 633 मीटर ऊंची पहाड़ियों के बीच बसी 'बूढ़ी मांडू' कभी प्राचीन काल में मांडवगढ़ और तरंगगढ़ के नाम से जानी जाती थी। परमार, राष्ट्रकूट और प्रतिहार काल की इस गौरवशाली प्राचीन नगरी में हिंदू और जैन स्थापत्य कला के अत्यंत दुर्लभ अवशेष आज भी मौजूद हैं। विडंबना यह है कि जिस ऐतिहासिक विरासत को देश की अमूल्य धरोहर माना जाना चाहिए, वह प्रशासनिक उपेक्षा और संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है।
🏚️ सदियों पुरानी यह प्राचीन नगरी आज वीरान और खंडहर में तब्दील
बूढ़ी मांडू के बिखरे हुए अवशेष इसकी प्राचीन समृद्धि और वैभव की पूरी कहानी बयां करते हैं। साल 1980 में यहां विशेष सफाई और पुरातात्विक कार्य के दौरान तीन प्राचीन शिव मंदिरों के अवशेष, किले का विशाल परकोटा, प्राचीन घाट, तालाब, शाही परिसर और बड़ी संख्या में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं मिली थीं। इनमें भगवान शिव, गणेश और विष्णु की मनमोहक प्रतिमाओं के साथ-साथ सातवें जैन तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ की प्रतिमा भी शामिल थी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस स्थल से कुल 250 से अधिक अमूल्य प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं।
⚖️ 204 प्रतिमाएं धार किले में सुरक्षित, बाकी का क्या हुआ?
सुरक्षा की दृष्टि से वर्ष 1980 के दशक में इनमें से 204 प्रतिमाओं को सुरक्षित रूप से धार किले में पहुंचा दिया गया था, लेकिन इसके बाद भी शेष बचे पुरावशेषों और मूर्तियों के संरक्षण की स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है। आज भी कई बेशकीमती प्रतिमाएं खुले आसमान के नीचे उपेक्षित पड़ी हैं। मौसम की मार, देखरेख का अभाव और प्राकृतिक क्षरण के कारण इनके अस्तित्व पर भारी संकट मंडरा रहा है।
🚨 न गार्ड, न फेंसिंग... तस्करों के साये में जीने को मजबूर ऐतिहासिक धरोहर
बूढ़ी मांडू के इस दुर्गम स्थल पर न तो नियमित सुरक्षा गार्डों की कोई व्यवस्था दिखाई देती है और न ही पूरे क्षेत्र में सुरक्षा के लिए तार फेंसिंग की गई है। चारों तरफ जंगल और दुर्गम भूभाग के बीच स्थित होने के कारण यहां सुरक्षा का संकट और अधिक गहरा जाता है। स्थानीय स्तर पर इन प्राचीन प्रतिमाओं के चोरी होने की आशंका और पुरावशेषों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता बनी हुई है। इस स्थल से पूर्व में चोरी या गायब हुई प्राचीन प्रतिमाओं का कोई व्यवस्थित अभिलेख या रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने से स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है।
🛣️ विरासत स्थल तक पहुंचना भी एक बड़ी चुनौती, मूलभूत सुविधाओं का अभाव
भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले इस पर्यटन व पुरातात्विक स्थल तक पहुंचने के लिए आज भी केवल कच्चे और ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों से ही गुजरना पड़ता है। यहां सड़क मार्ग, बिजली, शुद्ध पेयजल और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। दुर्गम पहुंच मार्ग होने के कारण आम पर्यटक तो दूर, शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और पुरातत्व प्रेमियों के लिए भी यहां तक पहुंचना बेहद कठिन साबित होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बूढ़ी मांडू केवल कुछ टूटे-फूट मंदिरों और बिखरी हुई मूर्तियों का सामान्य समूह नहीं है, बल्कि यह उस समृद्ध सांस्कृतिक और स्थापत्य परंपरा का जीवंत प्रमाण है जिसने सदियों पहले मांडू को एक संपन्न नगरी के रूप में स्थापित किया था। यदि इन अमूल्य पुरावशेषों का वैज्ञानिक तरीकों से संरक्षण, सुरक्षा, विधिवत अभिलेखीकरण और स्थल तक सड़क मार्ग की व्यवस्था जल्द नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए बूढ़ी मांडू केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज एक कहानी बनकर ही रह जाएगी।
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