हड़प्पाकालीन संस्कृति से लेकर गुप्तकालीन इतिहास तक, देश के 15 चुनिंदा पुरास्थलों में एमपी का एरण शामिल
सागर जिले के ऐतिहासिक एरण पुरास्थल को केंद्र सरकार की DESH योजना के तहत देश के 15 चुनिंदा स्थलों में शामिल किया गया है, जहां अब हाईटेक म्यूजियम बनेगा।
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल की ऐतिहासिक, पुरातात्विक और सांस्कृतिक धरोहरें पूरी दुनिया में अपनी विशेष पहचान रखती हैं। इस क्षेत्र में खजुराहो, ओरछा और दतिया जैसे प्रसिद्ध नाम तो शामिल हैं ही, लेकिन सागर जिले का 'एरण' एक ऐसा अद्वितीय स्थान है जहां हड़प्पा संस्कृति के समकालीन ताम्र पाषाण काल से लेकर गुप्तकालीन वास्तुकला और मूर्तिकला के एक से बढ़कर एक बेजोड़ उदाहरण मौजूद हैं। अब इतिहास में पहली बार ऐसा होने जा रहा है, जब एरण को केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी 'डेवलपमेंट ऑफ एक्स्कैवेशन साइट्स एंड हेरिटेज कॉम्प्लेक्स' (DESH) योजना के तहत देश के चुनिंदा 15 पुरास्थलों में आधिकारिक रूप से शामिल कर लिया गया है। इन सभी साइट्स को 'लिविंग कल्चरल स्पेस' के रूप में अत्याधुनिक तर्ज पर विकसित किया जाएगा। सागर की बीना तहसील के पास स्थित एरण मध्य प्रदेश से इस प्रतिष्ठित सूची में चुना जाने वाला एकमात्र पुरास्थल है। केंद्र सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले से अब यह प्रबल उम्मीद जग गई है कि एरण भी आने वाले समय में सांची और खजुराहो की तरह वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर चमक उठेगा।
💰 भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की DESH योजना: 1171 करोड़ के बजट से बनेगा ऑनसाइट हाईटेक म्यूजियम और व्याख्यान केंद्र
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) विभाग द्वारा शुरू की गई 'DESH' योजना (Development of Excavation Sites and Heritage Complexes - उत्खनन स्थलों और विरासत परिसरों का विकास) का मुख्य उद्देश्य देश के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों को जीवित सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में विकसित करना है। इस योजना के तहत पूरे देश से 15 प्रमुख स्थानों का चयन किया गया है, जिसमें मध्य प्रदेश से केवल एरण को जगह मिली है। इस पूरी योजना का कुल बजट 1171 करोड़ रुपए निर्धारित किया गया है। इस प्रोजेक्ट के तहत एरण में एक अत्याधुनिक 'ऑनसाइट हाईटेक म्यूजियम' बनाया जाएगा, जिसमें यहां की खुदाई के दौरान मिले प्राचीन दुर्लभ सिक्के, मिट्टी के प्राचीन बर्तन और ऐतिहासिक मूर्तदियां पूरी सुरक्षा के साथ संरक्षित की जाएंगी। इसके अलावा, यहां आने वाले देश-विदेश के पर्यटकों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को एरण के गौरवशाली इतिहास की विस्तृत जानकारी देने के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस एक भव्य व्याख्यान केंद्र भी स्थापित किया जाएगा।
📜 'भारतीय कला और संस्कृति में एरण का स्थान बेहद महत्वपूर्ण': प्रो. मोहन लाल चढ़ार
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय यूनिवर्सिटी के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मोहन लाल चढ़ार इस बारे में विस्तार से बताते हुए कहते हैं कि, ''बीना तहसील के समीप स्थित एरण पुरास्थल भारतीय कला, इतिहास और संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस ऐतिहासिक स्थल पर प्रागैतिहासिक कालीन संस्कृति, हड़प्पा सभ्यता के समकालीन ग्रामीण संस्कृतियों के अवशेष, ग्रामीण ताम्र पाषाण काल, महाजनपद काल, मौर्य, शुंग, सातवाहन, कुषाण काल, नागवंश और शक क्षत्रप शासकों के दुर्लभ पुरावशेष बड़ी मात्रा में मिलते हैं। इसके अलावा यहां गुप्तकालीन भव्य मंदिर और अद्वितीय मूर्तियां भी प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं, जो इसके समृद्ध अतीत की गवाही देते हैं।''
🛕 जीवंत परंपरा और राजवंशों की टकसाल: एरण को क्यों चुना गया DESH योजना के तहत?
प्रोफेसर मोहन लाल चढ़ार आगे बताते हैं कि इस पुरास्थल के ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां आज भी 'लिविंग ट्रेडिशन' यानी जीवंत परंपरा देखने को मिलती है। आज भी इस क्षेत्र में भारतीय संस्कृति का सजीव स्वरूप जीवित है और स्थानीय स्तर पर भागवत, वैष्णव, शैव तथा शाक्त धर्म से जुड़ी पूजा-अर्चना की परंपरा अनवरत जारी है। यहां पहली ईसा पूर्व से लेकर 12वीं शताब्दी तक की उत्कृष्ट मूर्तिकला का विकास क्रम स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसके अलावा, प्राचीन काल में यहां कई बड़े राजवंशों की अपनी टकसालें थीं, जहां सोने, चांदी और तांबे के सिक्के बड़ी मात्रा में ढाले जाते थे। इन्हीं सभी अद्वितीय पुरावशेषों और विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार और एएसआई ने एरण को इस राष्ट्रीय योजना के लिए चुना है।
🗺️ व्यापारिक मार्ग का प्रमुख पड़ाव और गुप्तकाल के विशाल सैन्य कैंप के रूप में रही है एरण की पहचान
केंद्र सरकार की इस महत्वकांक्षी परियोजना में मध्य प्रदेश से सिर्फ एरण को ही 'लिविंग कल्चरल स्पेस' के रूप में चुने जाने के पीछे कई अकादमिक और ऐतिहासिक तर्क दिए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि एरण एकमात्र ऐसा स्थान है जहां हड़प्पा संस्कृति के समकालीन ताम्र पाषाण कालीन संस्कृति के क्रमिक विकास के सबसे ठोस प्रमाण मिले हैं। इसके बाद के कालखंड का क्रमबद्ध इतिहास यहां जिस रूप में सुरक्षित है, वैसा राज्य में शायद ही कहीं और देखने को मिले। यहां गुप्त साम्राज्य के समय सिक्के ढालने वाली विशाल टकसाल के पुख्ता प्रमाण मिलने के साथ-साथ यह स्थान गुप्त साम्राज्य का एक बेहद महत्वपूर्ण सैन्य पड़ाव भी रहा है। इसके साथ ही, यहां भारत की सबसे बड़ी 'महावराह' की प्रतिमा, भगवान विष्णु की प्राचीन मूर्तियां, बलराम और कृष्ण के जन्म से जुड़े अवशेष तथा अन्य कई दुर्लभ ऐतिहासिक साक्ष्य मिले हैं। सबसे खास बात यह है कि प्राचीन काल से ही यह स्थान भारत के प्रमुख व्यापारिक मार्गों का एक अति महत्वपूर्ण और व्यस्त पड़ाव रहा है।
🏛️ एरण की अनमोल धरोहरें: सती अभिलेख से लेकर 48 फीट ऊंचे गरुड़ स्तंभ तक का इतिहास
एरण की असीम पुरातात्विक विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. मोहन लाल चढ़ार बताते हैं कि यहां मौर्य, शुंग, सातवाहन, कुषाण, नागवंश और शक शासकों के अलावा कई पूर्व मध्यकालीन राजवंशों के अवशेष बिखरे पड़े हैं। इस स्थल पर मिलने वाले प्रमुख ऐतिहासिक साक्ष्यों में निम्नलिखित अनमोल धरोहरें शामिल हैं:
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शक शासक श्रीधर वर्मा का पूर्व-गुप्तकालीन अभिलेख।
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सम्राट बुधगुप्त का प्रसिद्ध गरुड़ ध्वज अभिलेख और हूण शासक तोरमाण का अभिलेख।
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देश का सबसे पहला सती अभिलेख, जो गुप्तकालीन शासक भानुगुप्त के सेनापति गोपराज से जुड़ा हुआ है।
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पूर्व मध्यकालीन और मध्यकालीन काल के कुल 15 सती स्तंभ लेख।
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गुप्तकालीन नृवराह और महावराह की विशाल प्रतिमाएं, तथा समुद्रगुप्त के समय की भगवान विष्णु की प्रतिमा।
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भारत की सबसे ऊंची पशुवराह की प्रतिमा और कृष्णलीला से जुड़े कंस वध के 16 गुप्तकालीन कथानक।
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देश का इकलौता 48 फीट ऊंचा गरुड़ स्तंभ और 5 फीट सांप को पकड़े हुए गरुड़ का अभिलिखित स्तंभ।
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भगवान विष्णु के दस अवतारों के सुंदर चित्रण वाली विभिन्न दुर्लभ प्रतिमाएं और ऐतिहासिक अभिलेख।
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