कड़कनाथ के बाद अब झाबुआ की 'बालम ककड़ी' बनी आकर्षण का केंद्र, पहाड़ी खेतों में बिना खाद के होती है पैदावार

झाबुआ की प्रसिद्ध 'बालम ककड़ी' की मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में भारी डिमांड है। पूरी तरह ऑर्गेनिक और मीठी इस ककड़ी के दाम आसमान पर हैं।

Sep 28, 2026 - 19:17
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कड़कनाथ के बाद अब झाबुआ की 'बालम ककड़ी' बनी आकर्षण का केंद्र, पहाड़ी खेतों में बिना खाद के होती है पैदावार

मंदसौर : भगोरिया डांस और कड़कनाथ चिकन से फेमस आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिला लगातार नए कीर्तिमान रच रहा है। अब झाबुआ की 'बालम ककड़ी' मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि राजस्थान और गुजरात के अलावा सीमावर्ती राज्य महाराष्ट्र में भी खूब धूम मचा रही है। पहाड़ी खेतों में पैदा होने वाली परंपरागत वैरायटी की बालम ककड़ी पूरे साल में केवल मानसूनी सीजन में ही पैदा होती है। वहीं पूरी तरह ऑर्गेनिक और स्वाद में बेहद मीठी होने से ककड़ी की भारी डिमांड है। यही वजह है कि क्षेत्र के कई जिलों में इन दिनों यह ककड़ी खूब बिक रही है और भारी डिमांड से बालम ककड़ी के दाम भी अब सातवें आसमान पर हैं।

🌱 झाबुआ की बालम ककड़ी की बाजारों में जबरदस्त धूम

आमतौर पर सलाद में शामिल किए जाने वाले खीरा और ककड़ियों का खाने में तेजी से चलन बढ़ा है, जिसके कारण अब इनका व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू हो गया है। वैसे ककड़ी बारह मास खाया जाने वाला सलाद का फूड है। हर सीजन के हिसाब से उत्पादन देने वाली बीजों की वैराइटियां भी अब तेजी से चलन में आ रही हैं। नदी और तालाबों के किनारे गर्मी के मौसम में पैदा होने वाली ककड़ी पतली और लंबी होती है। आमतौर पर यह वैरायटी मई से जून की गर्मी में तरावट के लिए हर जगह बिकती नजर आती है।

📈 व्यावसायिक उत्पादन में रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोतरी और ग्रीन फाइबर फूड का क्रेज

बरसात के सीजन में पैदा होने वाली खीरा, पीली रेशम और तुंबा ककड़ी अलग-अलग क्षेत्र में बोई जाती है। यह परंपरागत बीजों से पैदा की जाने वाली किस्में हैं। खास बात यह है कि बदलते दौर में अब भागदौड़ भरी जिंदगी के चलते, चिकित्सक भी ग्रीन फाइबर फूड (ककड़ी) को सलाद में शामिल करने की सलाह दे रहे हैं। होटल और रेस्टोरेंट के अलावा हर तीसरे घर में सलाद की रानी माने जाने वाली ककड़ियों के उपयोग का चलन बढ़ने से भी व्यावसायिक उत्पादन तेजी से होने लगा है। इन दिनों पॉली हाउस और ग्रीन फील्ड में हरी चाइनीस खीरा ककड़ी का भी उत्पादन हर जगह शुरू हो गया है, लेकिन इन सब के बावजूद आदिवासी जिले झाबुआ, अलीराजपुर और रतलाम के पहाड़ी इलाकों में पैदा होने वाली बालम ककड़ी का स्वाद सबसे बेहतर और उम्दा है।

💰 हाइब्रिड ककड़ियों से करीब 4 गुना अधिक कीमत पर बिक रही बालम ककड़ी

बालम ककड़ी पहाड़ी खेतों में मानसूनी सीजन में बरसात के पानी से होती है। इसकी जून के महीने में बुवाई की जाती है। 3 महीने बाद पैदा होने वाली यह ककड़ी बाजार में बिकने वाली खीरा ककड़ियों की किस्म से बिल्कुल अलग है। इसकी एक ककड़ी का वजन ढाई से 3 किलो तक होता है। मानसूनी बौछारों और पहाड़ी मिट्टी में रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयों के बगैर पैदा होने वाली इस ऑर्गेनिक ककड़ी की अब देसी बाजारों में भारी डिमांड है। यही वजह है कि मालवा इलाके में यह ककड़ी अब कांटे के तौल के बजाय गिनती के नग के हिसाब से बिकती है, जिसकी कीमत हाइब्रिड ककड़ियों से करीब 4 गुना अधिक तक होती है।

🌍 मध्य प्रदेश सहित पड़ोसी राज्यों में भी लगातार बढ़ रही मांग

मंदसौर में झाबुआ की एक बालम ककड़ी 120 रुपए से लेकर 150 रुपए तक बिक रही है। सितंबर महीने के दौरान केवल दो हफ्ते तक मिलने वाली इस ककड़ी के शौकीन भी दूर-दराज से इसे खरीदने के लिए मालवा इलाके के बाजारों में पहुंच रहे हैं। रविवार के अवकाश के दिन उदयपुर से अपने रिश्तेदारों के यहां आए धीरज कुमार जीनगर ने मंदसौर के बाजारों में जब बालम ककड़ी को बिकते देखा तो उन्होंने जमकर खरीदारी की। उन्होंने बताया, "मैं बचपन से ही बालम ककड़ी का शौकीन हूं। मैं जब भी मंदसौर, रतलाम और झाबुआ जाता हूं तो इन ककड़ियों को खरीद लेता हूं।"

📉 कम उत्पादन और बंपर डिमांड से आसमान पर पहुंचे दाम

विक्रेता कंकू बाई ने बताया, "मैं झाबुआ के जोबट इलाके से यहां बालम ककड़ी बेचने आई हूं। मंदसौर के बस स्टैंड इलाके में दो स्टाल लगाकर दिनभर में 200 नग ककड़ी बेचती हूं। इस व्यवसाय का सालभर तक इंतजार रहता है। बड़ी और छोटी ककड़ी के साइज के हिसाब से 70 से लगाकर 150 रुपए प्रति ककड़ी के हिसाब से बेचती हूं। इलाके में इस बार हुई अल्प वर्षा के कारण इसका उत्पादन कम होने और भारी डिमांड के कारण रेट काफी ज्यादा हैं। बालम ककड़ी की वैरायटी परंपरागत वैरायटी है।"

👨‍🌾 कृषि वैज्ञानिकों का व्यावसायिक उत्पादन कर मुनाफा कमाने का आह्वान

कृषि वैज्ञानिक गजेंद्र सिंह चुंडावत ने बताया, "यह ककड़ी पहाड़ी इलाकों के खेतों में मानसून के दौरान पैदा होती है, जो आकार में काफी बड़ी होती है। यह ककड़ी आगे से पतली और पीछे से मोटी होकर हरे-भूरे रंग वाले शंकु आकार में होती है। खाने में काफी मुलायम और मीठी-रसीली होने से लोग इसे काफी पसंद करते हैं। दूसरा, पूरी तरह ऑर्गेनिक होने के कारण यह स्वास्थ्य के लिए भी काफी फायदेमंद मानी जाती है। उपयुक्त खेतों में किसानों को इसका व्यावसायिक उत्पादन कर अच्छा मुनाफा कमाना चाहिए।" बहरहाल, आदिवासी भगोरिया नृत्य और खाने के लजीज व्यंजन कड़कनाथ के नाम से देश-विदेश में पहचाने जाने वाले झाबुआ जिले में पैदा होने वाली बालम ककड़ी भी अब देश के बाजारों में धूम मचा रही है। भले ही थोड़ी महंगी ही सही, लेकिन यहां के शौकीन लोगों को इस देसी ककड़ी को खाने का काफी मजा आ रहा है।

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