जानिए सिंधिया राजघराने की सूफी संत बाबा मंसूर शाह से जुड़ी 300 साल पुरानी आस्था की कहानी

केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया एक दिवसीय दौरे पर ग्वालियर पहुंचे। यहां उन्होंने राजघराने की 300 साल पुरानी परंपरा निभाते हुए बाबा मंसूर शाह के उर्स में चादरपोशी की और आशीर्वाद लिया।

Sep 29, 2026 - 13:43
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जानिए सिंधिया राजघराने की सूफी संत बाबा मंसूर शाह से जुड़ी 300 साल पुरानी आस्था की कहानी

केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सोमवार को अपने एक दिवसीय प्रवास पर ग्वालियर पहुंचे। इस दौरान ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर सैकड़ों की संख्या में मौजूद समर्थकों और भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनका जोरदार और भव्य स्वागत किया। केंद्रीय मंत्री सिंधिया यहां ग्वालियर राजघराने की करीब 300 साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा को निभाने के लिए प्रसिद्ध सूफी संत बाबा मंसूर शाह के उर्स में शामिल होने पहुंचे थे।

🕌 मंसूर शाह के उर्स में पहुंचे केंद्रीय मंत्री सिंधिया, समर्थकों की उमड़ी भीड़

देश के केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस एक दिवसीय दौरे की सूचना पार्टी कार्यकर्ताओं और उनके समर्थकों को पहले से ही मिल चुकी थी। यही वजह थी कि उनकी ट्रेन के स्टेशन पर पहुंचने से काफी पहले ही रेलवे स्टेशन के अंदर और बाहर भारी भीड़ जुटना शुरू हो गई थी। हर कोई अपने चहेते नेता की एक झलक पाने के लिए उत्सुक नजर आ रहा था।

🥻 पारंपरिक शाही धोती और ओढ़नी में आए नजर, महाराज बाड़ा स्थित गोरखी देवघर में की पूजा

रेलवे स्टेशन से सीधे केंद्रीय मंत्री महाराज बाड़ा स्थित ऐतिहासिक गोरखी के लिए रवाना हुए। गोरखी पहुंचने के बाद सिंधिया ने राजपरिवार की पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए सबसे पहले कुलदेवी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और इसके बाद बाबा मंसूर शाह औलिया की दरगाह पर पहुंचकर चादरपोशी की तथा आशीर्वाद लिया। इस दौरान सिंधिया पारंपरिक शाही परिधान यानी धोती और ओढ़नी पहने हुए नजर आए और करीब एक घंटे तक महाराज बाड़ा स्थित देवघर में रहे।

📜 सिंधिया राजघराने की 300 साल पुरानी परंपरा, चमत्कार से जुड़ी है गहरी आस्था की कहानी

आपको बता दें कि सिंधिया राजघराने में यह अनूठी परंपरा पिछले 300 सालों से लगातार चली आ रही है। इस परंपरा के तहत राज परिवार का मुखिया हर साल देवघर गोरखी स्थित मंदिर में पूजा-अर्चना करता है और बाबा मंसूर शाह औलिया के उर्स में पूरी श्रद्धा के साथ शामिल होता है। इस रस्म के दौरान परिवार का मुखिया उर्स में तब तक बैठता है, जब तक फूलों से सजे गुंबद से एक फूल अपने आप नीचे नहीं गिर जाता है, जिसे शुभ संकेत माना जाता है।

⚔️ पानीपत के युद्ध और महादजी सिंधिया से जुड़ी है मंसूर शाह पर अटूट आस्था की कहानी

इस अटूट आस्था के पीछे इतिहास की एक दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है। सिंधिया राजवंश के संस्थापक महादजी सिंधिया पानीपत के युद्ध के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके बाद उनके परिजनों को उनकी सलामती की भारी चिंता सता रही थी। उस विकट समय में महादजी की पत्नी और उनकी मां सूफी संत बाबा मंसूर शाह के दरबार में पहुंची थीं। तब बाबा मंसूर शाह ने उन्हें महादजी सिंधिया के सकुशल जीवित लौटने का पूरा भरोसा दिलाया था। कुछ ही दिनों बाद जब महादजी घायल अवस्था में भी जीवित लौट आए, तब से लेकर आज तक पूरा सिंधिया परिवार बाबा मंसूर शाह पर अटूट भरोसा और अगाध श्रद्धा रखता है।

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