कोनोकार्पस और सप्तपर्णी पौधों पर हाईकोर्ट सख्त, इंदौर नगर निगम को दिए सख्त निर्देश
इंदौर हाईकोर्ट ने कोनोकार्पस और सप्तपर्णी पौधों के रोपण को लेकर नगर निगम को नोटिस जारी किया है। ये पौधे मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं।
हरियाली और खुशबू के नाम पर लगाए जाने वाले कोनोकार्पस (Conocarpus) और सप्तपर्णी (Alstonia Scholaris) के पौधे मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और भूजल के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं। इस गंभीर मुद्दे को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई हुई है। कोर्ट ने इंदौर नगर निगम को नगरीय प्रशासन एवं विभाग के उस सर्कुलर का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए हैं, जिसके तहत 9 जनवरी 2026 को ही इन नए पौधों के रोपण पर पूरी तरह रोक लगाई जा चुकी है।
⚖️ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर, स्थानीय प्रजाति के पौधे लगाने की मांग
बीते कुछ वर्षों में इंदौर समेत प्रदेश के कई हिस्सों में इन विदेशी पौधों को बड़े पैमाने पर लगाया गया है, जिससे नागरिकों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हो रही हैं। इस मामले में लॉ के छात्र गोपाल जोशी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर तर्क दिया कि नगर निगम और अन्य निकाय अपने ही विभागों के प्रतिबंधात्मक आदेशों का उल्लंघन कर रहे हैं। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि शहर से इन खतरनाक पेड़ों को हटाकर उनकी जगह नीम, पीपल और जामुन जैसे पर्यावरण के अनुकूल स्थानीय पौधे रोपे जाएं, जिस पर कोर्ट ने नगर निगम को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
🩺 विशेषज्ञों की चेतावनी: अस्थमा, एलर्जी और तेजी से भूजल सोखने का बनाते हैं कारण
वनस्पति शास्त्रियों के अनुसार, कोनोकार्पस और सप्तपर्णी के परागकण हवा में फैलकर लोगों में अस्थमा, सांस की तकलीफ, स्किन एलर्जी और सिरदर्द जैसी गंभीर समस्याएं पैदा करते हैं। कोनोकार्पस का पेड़ भारी मात्रा में भूजल सोखता है, जिससे जलस्तर तेजी से गिरता है और इसके आसपास कोई अन्य घास या पौधे नहीं उग पाते। वहीं, सप्तपर्णी के फूलों की तेज गंध से उल्टी और घबराहट जैसी शिकायतें आम होती हैं। सुप्रीम कोर्ट और देश के कई राज्य पहले ही इन पेड़ों के रोपण पर प्रतिबंध लगा चुके हैं।
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