छतरपुर के प्रसिद्ध मां काली और पीतांबरा माता मंदिर में उमड़ी भक्तों की भीड़, जानें इतिहास
छतरपुर में शारदीय नवरात्रि पर मां काली और पीतांबरा माता मंदिर में भक्तों का तांता लगा है। जानिए इन ऐतिहासिक और चमत्कारी मंदिरों की पूरी मान्यता।
शक्ति की उपासना के पावन पर्व 'शारदीय नवरात्रि' की शुरुआत के साथ ही देश-दुनिया के प्रसिद्ध देवी मंदिरों में भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया है। इसी कड़ी में मध्य प्रदेश के छतरपुर स्थित मां काली और पीतांबरा माता मंदिर की महत्ता काफी बढ़ जाती है। छतरपुर की रक्षा करने वाली मां काली और हर क्षेत्र में विजय दिलाने वाली पीतांबरा माता के दरबार में भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दोनों ही मंदिरों में भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति और जीवन में सफलता पाने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
🐅 कलकत्ता से छतरपुर लाई गई थी महाकाली की प्रतिमा, आज भी रात में कोई नहीं रुकता मंदिर में
मंदिर के पुजारी राजकुमार गोस्वामी के अनुसार, छतरपुर के महाराजा विश्वनाथ सिंह के निर्देश पर कलकत्ता से मां काली की यह दिव्य प्रतिमा लाई गई थी ताकि शहर की रक्षा हो सके। मान्यता है कि माता पुष्य नक्षत्र में चली थीं और जहां नक्षत्र समाप्त हुआ, वहीं उनकी स्थापना कर दी गई। आज भी इस मंदिर में रात्रि के समय कोई विश्राम नहीं करता। नारियल की अर्जी के माध्यम से यहां आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है और माता के दर्शन मात्र से नकारात्मक ऊर्जा या बाधाओं का अंत हो जाता है।
📝 पीतांबरा माता के दरबार में अर्जी लगाने का अनूठा तरीका, हाथी पर सवार होकर आईं माता
शहर से 8 किलोमीटर दूर सटई रोड स्थित प्राचीन पीतांबरा माता मंदिर की लीला भी निराली है। पुजारी बृजेश महाराज बताते हैं कि यहां भक्तों को अपनी समस्या से छुटकारा पाने के लिए एक 'आवेदन' देना होता है, जिसमें नाम, पता, समस्या और इससे पहले कहां-कहां इलाज या प्रयास किया गया है, उसका पूरा विवरण फोटो सहित देना पड़ता है। जो भक्त दूर रहते हैं वे डाक से भी अर्जी भेजते हैं। वहीं, कथावाचक सौरभ तिवारी का कहना है कि इस बार नवरात्रि पर माता रानी का आगमन हाथी की सवारी पर हुआ है, जिसे बहुत शुभ माना जा रहा है।
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