सुनार दंपत्ति ने 50 साल पहले बिना जोड़ की बनाई थी मां शीतला की मूर्ति, तीन साल की तपस्या का है अनोखा इतिहास

सागर के इतवारी टोरी स्थित शीतला माता मंदिर में स्थापित पीतल की मूर्ति को एक दंपत्ति ने 50 साल पहले तीन साल की कठिन तपस्या के बाद खुद ढाला था।

Oct 11, 2026 - 13:29
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सुनार दंपत्ति ने 50 साल पहले बिना जोड़ की बनाई थी मां शीतला की मूर्ति, तीन साल की तपस्या का है अनोखा इतिहास

मां जगतजननी की आराधना के लिए भक्त अक्सर कठिन व्रत और अनुष्ठान करते हैं, लेकिन सागर के इतवारी टोरी स्थित मां शीतला देवी के मंदिर की कहानी बेहद अनूठी और प्रेरणादायक है। यहां स्थापित मां दुर्गा और शीतला माता की प्रतिमा को किसी पेशेवर मूर्तिकार ने नहीं, बल्कि एक निसंतान दंपत्ति ने आज से 50 साल पहले लगातार तीन साल तक व्रत रखकर अपने हाथों से ढाला था। इतवारी टोरी के रहने वाले गंगाप्रसाद सोनी पेशे से सुनार थे, जिनकी पत्नी कलावती के साथ माता मेंगागागागागागा गहरी आस्था थी। इसी अटूट विश्वास के चलते उन्होंने अपने घर पर ही भट्टी जलाई और बिना किसी जोड़ वाली ठोस पीतल की अद्भुत प्रतिमा तैयार कर डाली, जो आज क्षेत्र की विशेष आस्था का केंद्र है।

👶 निसंतान दंपत्ति ने की थी तीन साल की कठिन तपस्या, घर पर भट्टी जलाकर बनाई थी प्रतिमा

मंदिर प्रबंधन से जुड़े संतोष सोनी बताते हैं कि उनके फूफा गंगाप्रसाद सोनी और बुआ कलावती की कोई संतान नहीं थी, और उन्होंने अपना पूरा जीवन मां की सेवा में समर्पित कर दिया था। करीब 50 साल पहले उनके मन में अपने हाथों से मां की प्रतिमा तैयार करने का विचार आया। दोनों पति-पत्नी ने मूर्ति बनने तक लगातार व्रत रखा। कई बार असफलताओं और कमियों के बाद आखिरकार तीन साल की कठिन साधना के बाद बिना जोड़ के ठोस पीतल की शीतला माता की मूर्ति बनकर तैयार हुई, जिसे बाद में घर के नजदीक ही स्थापित किया गया। उम्रदराज होने पर उन्होंने मंदिर की जिम्मेदारी अपने परिजनों को सौंप दी थी।

🎨 कला का बेजोड़ नमूना और आरोग्यता की देवी: जनसहयोग से हुआ मंदिर का जीर्णोद्धार

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मूर्ति पूरी तरह से ठोस पीतल से बनी है और इसमें कहीं भी कोई जोड़ नहीं है, जो आज के समय में बेहद दुर्लभ कला है। पंडित शिव प्रसाद तिवारी के अनुसार, स्कंद पुराण में शीतला माता को चेचक, खसरा जैसे ग्रीष्मकालीन रोगों से मुक्ति दिलाने वाली आरोग्यता की देवी माना जाता है। समय के साथ जब मूल मंदिर जीर्ण-शीर्ण होने लगा, तो स्थानीय नागरिकों और पार्षद बाबूसिंह यादव के जनसहयोग से इसे नया स्वरूप दिया गया। आज दूर-दूर से श्रद्धालु संतान प्राप्ति और आरोग्यता की मनोकामना लेकर इस पावन दरबार में पहुंचते हैं।

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