जहां जलते हैं पुतले, वहां होती है 'जय लंकेश' की जय-जयकार; नाभि में तेल चढ़ाने से पूरी होती हैं मन्नतें
विदिशा के रावण गांव में दशहरे पर नहीं होता पुतला दहन, बल्कि ग्राम देवता के रूप में होती है पूजा। जानें क्या है इस अनोखी परंपरा का इतिहास।
विदिशा। देशभर में जहां विजयादशमी के अवसर पर रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाया जाता है, वहीं मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक ऐसा अनूठा गांव है जहां रावण का वध नहीं बल्कि उनकी पूजा की जाती है। नटेरन तहसील के अंतर्गत आने वाले 'रावण' नामक इस गांव में रावण को ग्राम देवता के रूप में पूजने की परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। यहां लोगों की आस्था का आलम यह है कि गांव के प्रवेश द्वार, सरकारी स्कूल के बोर्ड और निजी वाहनों पर भी गर्व से 'जय लंकेश' लिखा हुआ है, और कई युवाओं ने अपने शरीर पर रावण के टैटू भी गुदवा रखे हैं।
🥥 नाभि में तेल चढ़ाने की है विशेष मान्यता: विवाह के समय सबसे पहले रावण बाबा को दिया जाता है निमंत्रण
जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में लगभग 12 फीट लंबी रावण बाबा की प्राचीन पाषाण प्रतिमा स्थापित है, जहां दशहरे के दिन विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक और भंडारे का आयोजन होता है। ग्रामीणों की गहरी मान्यता है कि रावण बाबा उनके गांव की रक्षा करते हैं, इसलिए किसी भी नए कार्य या विवाह के अवसर पर सबसे पहले उन्हें ही आमंत्रित किया जाता है। श्रद्धालु उनकी प्रतिमा की नाभि में तेल अर्पित कर अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं। इतिहासकार इस स्थान से जुड़ी कई स्थानीय लोककथाओं और भूदो पहाड़ी की दंतकथाओं का जिक्र करते हैं, जो इस अनोखे गांव की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को और अधिक रोचक बनाते हैं।
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