विभाजन के बाद शुरू हुई 74 साल पुरानी परंपरा, जानें नवमी को क्यों मनाया जाता है पंजाबी दशहरा
जबलपुर में 74वें पंजाबी दशहरे का भव्य आयोजन। कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह ने निभाई विशेष परंपरा, अगले साल मनाई जाएगी 75वीं वर्षगांठ। जानिए इसका इतिहास।
जबलपुर। मध्य प्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर में 74वें पंजाबी दशहरे का भव्य और ऐतिहासिक आयोजन आयुर्वेदिक कॉलेज मैदान में संपन्न हुआ। इस अनूठे उत्सव में हजारों की संख्या में शहरवासी शामिल हुए। आयोजन का मुख्य आकर्षण तब बना जब प्रदेश के कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह ने अपनी परंपरा के अनुसार भगवान राम को अपने कंधे पर बिठाकर रावण दहन की प्रक्रिया पूरी की। मैदान में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के 50 फीट ऊंचे भव्य पुतले स्थापित किए गए थे। दहन से पूर्व छोटी रामलीला का मनमोहक मंचन हुआ और करीब एक घंटे तक गगनचुंबी आतिशबाजी ने पूरे आसमान को सतरंगी रोशनी से सराबोर कर दिया।
📜 देश विभाजन के बाद पंजाब से आए परिवारों ने रखी थी नींव: नवमी को मनाया जाने वाला प्रदेश का एकमात्र दशहरा
जबलपुर का यह पंजाबी दशहरा अपनी बेहद खास परंपराओं के लिए जाना जाता है। यह पूरे मध्य प्रदेश का एकमात्र ऐसा दशहरा आयोजन है जिसे दशमी के बजाय नवमी के दिन मनाया जाता है। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के बाद पंजाब से जबलपुर आकर बसे परिवारों ने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों को जीवित रखने के लिए इसकी शुरुआत की थी, जो आज पूरे शहर की साझा पहचान बन चुका है। कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह ने घोषणा की कि अगले वर्ष इसके 75 वर्ष पूरे होने पर डायमंड जुबली समारोह को और भी अधिक भव्य व ऐतिहासिक स्तर पर आयोजित किया जाएगा।
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