शहडोल के आदिवासियों ने बचा कर रखी चीन से आई विलुप्त होती फसल 'कागुन', जानें इसके गजब के फायदे
शहडोल के आदिवासी इलाकों में आज भी हो रही है विलुप्त होती फसल 'कागुन' की खेती। जानिए इस सुपरफूड के फायदे, खेती का तरीका और पोषण संबंधी खास बातें।
शहडोल। विंध्य क्षेत्र के शहडोल जिले में आज भी ऐसी कई प्राचीन और दुर्लभ फसलों की खेती की जा रही है जो धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी हैं। श्री अन्न यानी मिलेट्स के संरक्षण का यह जिम्मा यहां के आदिवासी किसानों ने बखूबी संभाल रखा है। मझगवां गांव की सलैया टोला में रहने वाली बैरमतिया बैगा जैसी आदिवासी महिलाएं आज भी अपनी पुरानी परंपरा और देसी बीजों को सहेजे हुए हैं। कृषि वैज्ञानिक डॉ. बीके प्रजापति के अनुसार, 'कागुन' (जिसका वैज्ञानिक नाम सेटेरिया इटालिका और अंग्रेजी नाम फॉक्सटेल मिलेट है) की उत्पत्ति आज से 8-10 हजार साल पहले चीन में हुई थी, जहां से यह पूरी दुनिया में फैला। आदिवासी अंचल के लोग इसे अपने दैनिक खान-पान में शामिल करते हैं, जिससे वे आज भी कई गंभीर बीमारियों से दूर रहते हैं।
🧪 कैल्शियम, आयरन और प्रोटीन का पावरहाउस है कागुन: कम पानी में होती है खेती, कृषि वैज्ञानिकों ने बताए उगाने के तरीके
वैज्ञानिकों के अनुसार, कागुन एक शुष्क और कम पानी वाली भूमि पर उगने वाली फसल है जो 90 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है। शहडोल के ट्राइबल बेल्ट में लाल, पीले (सफेद) और काले रंग की कागुन वैरायटी उगाई जाती है, जिसे मक्का, अरहर, कोदो और कुटकी के साथ मिक्स करके बोया जाता है। इस मोटे अनाज में कैल्शियम, मैग्नीशियम, आयरन, विटामिन बी-1, 12-13% प्रोटीन और 7-8% फाइबर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसे चावल की तरह या इसके आटे से बनी रोटियों व लड्डू के रूप में खाया जाता है। वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. मृगेंद्र सिंह का कहना है कि आदिवासी अंचल के लोग इन केमिकल-मुक्त पारंपरिक बीजों और अनाजों का सेवन कर रहे हैं, जिससे न केवल पर्यावरण और परंपरागत बीज संरक्षित हो रहे हैं, बल्कि उनका स्वास्थ्य भी पूरी तरह दुरुस्त रहता है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)