हरियाणा के पानीपत की तर्ज पर बालाघाट में अनोखा दशहरा, 40 किलो वजनी मुकुट और कठिन साधना की परंपरा
बालाघाट में 63 सालों से मनाई जा रही पानीपत की तर्ज पर दशहरे की अनूठी परंपरा। 40 किलो वजनी मुकुट और हनुमान जी का चोला धारण करने से पहले होती है कठिन साधना।
बालाघाट। असत्य पर सत्य की जीत का पर्व दशहरा पूरे देश में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के बालाघाट का दशहरा अपने आप में बेहद अनोखा और अलग पहचान रखता है। यहां हरियाणा के पानीपत की तर्ज पर पिछले 63 वर्षों से लगातार दशहरा मनाया जा रहा है। इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें हनुमान जी का चोला धारण करने वाले साधक को अपने सिर पर 40 किलो वजनी भारी-भरकम मुकुट रखकर नगर भ्रमण करना होता है। इस जीवंत झांकी के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं, जो आस्था, साधना और संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
📜 पाकिस्तान के मुजफ्फरगढ़ से जुड़ी है शुरुआत की कहानी: 40 दिनों की कठिन तपस्या और ब्रह्मचर्य के बाद धारण किया जाता है चोला
साधक अमन गांधी बताते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत लगभग 80 साल पहले अविभाजित भारत के पाकिस्तान स्थित मुजफ्फरगढ़ जिले के लैय्या से हुई थी, जिसे विभाजन के बाद भारत लाया गया। बालाघाट में इसकी शुरुआत सन 1963 में तेजवान जी आहूजा द्वारा की गई थी। इस भव्य स्वरूप को पाने के लिए साधक को दशहरा से 40 दिन पहले अत्यंत कठिन तपस्या से गुजरना पड़ता है। इस दौरान वे घर-परिवार त्यागकर मंदिर में ही निवास करते हैं, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, लहसुन-प्याज का त्याग कर सिर्फ फलाहार करते हैं, बिस्तर की बजाय जमीन पर चटाई पर सोते हैं और लगातार राम नाम का जाप व सुंदरकांड का पाठ करते हैं।
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