रावण दहन के बाद दुश्मनों को भी पान खिलाते हैं छतरपुर के लोग, जानें बुंदेली पान का कराची और पाकिस्तान कनेक्शन
छतरपुर में विजयादशमी पर रावण दहन के बाद एक-दूसरे को पान खिलाकर दुश्मनी भुलाने की अनूठी परंपरा। कभी पाकिस्तान में भी मशहूर था यहां का देशज बुंदेली पान।
छतरपुर। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में रावण दहन के साथ ही एक ऐसी ऐतिहासिक और पावन परंपरा की शुरुआत होती है, जो समाज में सौहार्द और भाईचारे का संदेश देती है। यहां विजयादशमी की रात रावण दहन होते ही लोग एक-दूसरे को तिलक लगाकर, गले मिलकर और 'पान का बीड़ा' खिलाकर पुराने सभी मनमुटाव व गिले-शिकवे भुला देते हैं। इस परंपरा को बुंदेली भाषा में 'दशहरा मिलन' कहा जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पान खिलाने का यह रिवाज आल्हा-ऊदल के जमाने से चला आ रहा है। लोग घरों और मंदिरों में भगवान को भी पहला पान अर्पित करते हैं, जिसके बाद मेहमानों का स्वागत पान की थालियों से किया जाता है।
🇵🇰 1971 के युद्ध से पहले पाकिस्तान तक थी छतरपुर के पान की धमक: युद्ध के बाद रोक दी गई थी सप्लाई
इस ऐतिहासिक परंपरा के साथ छतरपुर के पान का एक बेहद दिलचस्प अंतराष्ट्रीय कनेक्शन भी जुड़ा हुआ है। बीजेपी नेता और पान खेती के जानकार सुरेंद्र चौरसिया बताते हैं कि छतरपुर जिले के महाराजपुर, गढ़ी मलहरा और पड़ोसी यूपी के महोबा में उगने वाला विशेष देशी पान अपनी मिठास और स्वाद के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध था। आजादी के बाद भी पाकिस्तान के शौकीनों के बीच छतरपुर के देशी पान की भारी मांग रहती थी और यहां से नियमित आपूर्ति होती थी। हालांकि, वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों में आई खटास के चलते पाकिस्तान को होने वाले इस पान के निर्यात पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी।
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