सेठानी घाट पर 147 साल पुरानी रामलीला की अनूठी परंपरा, तंबाकू के पत्तों में आज भी सुरक्षित हैं जानकी जी के प्राचीन वस्त्र
नर्मदापुरम के सेठानी घाट पर 147 साल पुरानी रामलीला की अनूठी परंपरा। यहां 4-5 पीढ़ियों से परिवार के लोग निभा रहे हैं रामलीला में विभिन्न किरदार।
नर्मदापुरम। शहर के प्रसिद्ध सेठानी घाट पर करीब 147 वर्ष पहले सेठ नन्हेंलाल घासीराम के मार्गदर्शन में शुरू हुई रामलीला महोत्सव की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है। इस ऐतिहासिक रामलीला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके शुरुआती दौर में बनारस से मंगवाई गई पोशाकें और वस्त्र आज भी सुरक्षित रखे गए हैं। आयोजकों के अनुसार, इतने पुराने और ऐतिहासिक कपड़ों में कीड़े न लगें, इसलिए उन्हें तंबाकू के बड़े-बड़े पत्तों के बीच सहेजकर रखा जाता है, जिससे उनकी चमक और गुणवत्ता आज भी बरकरार है। बनारस से आए उन कपड़ों में मां जानकी के वस्त्र आज भी विशेष रूप से सहेज कर रखे गए हैं।
🌳 4 से 5 पीढ़ियों से चली आ रही है अभिनय की विरासत: खानदानी पेशे की तरह रामलीला में सेवा दे रहे हैं कलाकार
इस रामलीला का एक और अनूठा पहलू यहां की पारिवारिक और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपरा है। रामलीला में अभिनय करने वाले अधिकांश कलाकारों की 4 से 5 पीढ़ियां इस धार्मिक आयोजन से जुड़ी हुई हैं। कलाकार आयुष दुबे, अतुल दुबे और गोपाल शुक्ला बताते हैं कि उनके परदादा, दादा और पिता के बाद अब युवा पीढ़ी भी राम, लक्ष्मण, सीता और अन्य प्रमुख भूमिकाओं में अपनी सेवाएं दे रही है। लगभग 50 से 60 पात्रों वाले इस भव्य आयोजन में आज भी पंडित गिरजाशंकर शर्मा, भवानी शंकर शर्मा और संयोजक मुन्नू दुबे के मार्गदर्शन में इस सांस्कृतिक धरोहर को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
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