दमोह में 200 साल पुराना मां कंकाली का दिवाला, 5वीं पीढ़ी कर रही सेवा; जानें जवारे का वैज्ञानिक महत्व
दमोह के असाटी वार्ड स्थित 200 वर्ष पुराने मां कंकाली दिवाले में उमड़ी भीड़। जानिए नवरात्रि में जवारे बोने का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व।
दमोह। बुंदेलखंड में प्रत्येक त्योहार का अपना एक खास धार्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक महत्व है। दमोह नगर का सबसे पुराना 'मां कंकाली माई' का दिवाला असाटी वार्ड में स्थित है, जो 200 वर्षों से भी अधिक प्राचीन माना जाता है। वर्तमान में चौरसिया परिवार की पांचवीं पीढ़ी इस दिव्य स्थान की सेवा कर रही है। 80 वर्षीय पंडा चंदूलाल चौरसिया बताते हैं कि इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां किसी भी प्रकार का टोना-टोटका या तंत्र-मंत्र नहीं होता, बल्कि पूरी निष्ठा और श्रद्धा भाव से मां की आराधना व जवारों का पूजन किया जाता है। नवरात्रि के पावन अवसर पर यहां दूर-दराज से भक्तों का सैलाब उमड़ता है।
🌾 नवरात्रि में जवारे बोने का धार्मिक और वैज्ञानिक रहस्य: शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने के साथ ही फसल का भी देता है संकेत
पुरोहित पंडित चंद्र गोपाल पौराणिक और महेंद्र दुबे शास्त्री के अनुसार, चैत्र और आश्विन नवरात्रि के समय ऋतु परिवर्तन होता है, जिससे शरीर में बीमारियां बढ़ने की संभावना रहती है। इस दौरान उपवास रखने और जवारों के सानिध्य में रहने से शरीर को भरपूर ऑक्सीजन व तुरंत ऊर्जा मिलती है। जवारे के रस में विटामिन A, C, E, K, B-कॉम्प्लेक्स सहित कैल्शियम, आयरन और मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाते हैं। इसके अलावा, जवारे को सृष्टि की पहली फसल माना गया है। यदि जवारे हरे-भरे और तेजी से बढ़ते हैं, तो इसे आगामी वर्ष अच्छी फसल और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।
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