आधुनिक दौर में भी प्राचीन बीजों का संरक्षण कर रहे शहडोल के किसान, जानिए क्या है आदिवासियों की सेहत का राज

शहडोल के आदिवासी अंचल में किसान झोलार धान, लेदरी कोदो और बेमेरहा कुटकी जैसी विलुप्त होती देसी और मिलेट्स किस्मों का संरक्षण कर रहे हैं। जानिए इनके स्वास्थ्य लाभ।

Sep 26, 2026 - 20:15
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आधुनिक दौर में भी प्राचीन बीजों का संरक्षण कर रहे शहडोल के किसान, जानिए क्या है आदिवासियों की सेहत का राज

शहडोल: झोलार, बांसपोर, ठर्री... ये वो नाम हैं जो शायद ही आपने कभी सुने होंगे। यह धान की ऐसी दुर्लभ किस्में हैं जिनकी पैदावार मुख्य रूप से आदिवासी क्षेत्रों में ही होती है और ज्यादातर स्थानीय आदिवासी ही इनका उपयोग करते हैं। इसी तरह लेदरी कोदो, बेमेरहा कुटकी, जाली कुटकी और झमटहा कुटकी जैसे कई अन्य नाम भी हैं, जो मोटे अनाज यानी मिलेट्स की अलग-अलग वैरायटी हैं और अब धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच रही हैं। आदिवासियों की अच्छी सेहत का राज यही तमाम पारंपरिक फसलें हैं, जिनकी पैदावार वे खुद अपने खेतों में करते हैं और साल भर इनका सेवन करते हैं। वे इन बीजों को किसी अनमोल खजाने से कम नहीं मानते और इसके संरक्षण में पूरी शिद्दत से जुटे हुए हैं।

🌿 मोटे अनाज के साथ देसी धान की किस्मों का अनूठा संरक्षण

शहडोल का एक ऐसा गांव जहां मोटे अनाज की वो सभी प्राचीन किस्में न केवल आज भी मौजूद हैं, बल्कि रोजमर्रा के खानपान में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रही हैं। यह है मजगवां गांव का सलैया टोला, जहां बैगा और भूमिया जनजाति की घनी बस्ती है। यहां के लोग आज भी ऐसे मोटे अनाजों का संरक्षण कर रहे हैं जो दुनिया के बाकी हिस्सों में विलुप्त हो चुके हैं। वे इन्हीं मोटे अनाजों की खेती करते हैं और रोजाना इनका सेवन करते हैं। कागुन, कुटकी और भदैला कुटकी जैसे कई मिलेट्स, जिनका नाम आज की पीढ़ी भूल चुकी है, यहां जीवंत हैं। ट्राइबल बेल्ट के ये ग्रामीण धान की भी कई ऐसी पुरानी देसी किस्मों को सहेजे हुए हैं, जिनके नाम अब आम लोगों को पता भी नहीं हैं।

🍛 जिंदा हैं 'झोलार' और 'बांसपोर' जैसी देसी धान की किस्में

झोलार, बांसपोर और ठर्री धान की वे पारंपरिक किस्में हैं जिनकी खेती आज भी यहां की जाती है। इसी तरह लेदरी कोदो, बेमेरहा कुटकी, जाली कुटकी और झमटहा कुटकी जैसी मिलेट्स की वैराइटीज का उत्पादन ग्रामीण बड़े पैमाने पर करते हैं। मजगवां गांव के कई आदिवासी किसान आज भी इनकी खेती से जुड़े हैं, जो उनके जीवन यापन का मुख्य आधार है। यही वजह है कि आज भी ये अनोखे नाम वाले देसी अनाज जिंदा हैं, और इसी कारण इस क्षेत्र के आदिवासियों को 'देसी अनाज के असली संरक्षक' के रूप में जाना जाता है।

🌱 देसी धान से लेकर मोटे अनाज तक की खेती कर रहे हैं किसान

मजगवां गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान भोल्ली सिंह ने अपने खेतों में धान की कई अलग-अलग देसी और पारंपरिक किस्में लगा रखी हैं। इसके अलावा उन्होंने मोटे अनाज की भी कई वैराइटीज को सहेजा है। किसान भोल्ली सिंह बताते हैं, "मैंने खेतों में झोलार धान, बांसपोर, सरैय्या, गुरमटिया, करन फूल और भेजरी जैसी देसी धान की पुरानी किस्में उगा रखी हैं। इसके अलावा मोटे अनाज के तहत कोदो, मकाई, कागुन, कुटकी, लेदरी कोदो और बासिन कोदो की भी खेती करता हूं।"

💪 "देसी अनाज ही हमारी लंबी उम्र और सेहत का असली राज है"

मजगवां गांव की ही रहने वाली बेरमतिया बैगा बताती हैं, "मैंने अपने खेत में समा, कुटकी, सिकिया, काकुन के साथ-साथ धान की पारंपरिक किस्में जैसे सरैय्या धान और ठर्री धान लगा रखी हैं।" उनका मानना है कि वे आज भी पुराने बीजों को इसलिए संरक्षित कर रही हैं क्योंकि शुद्ध देसी अनाज खाना ही उनकी सेहत का सबसे बड़ा राज है। वे इसकी तुलना आधुनिक पोल्ट्री और देसी मुर्गी से करते हुए कहती हैं कि देसी खान-पान का मजा ही कुछ और है, और ऐसे पारंपरिक अनाज को भला कौन पसंद नहीं करेगा? इसी तरह भोल्ली सिंह अपनी दिनचर्या के बारे में बताते हैं कि आज 60 वर्ष से अधिक उम्र होने के बावजूद वे हर दिन मोटा अनाज खाते हैं, जिसके दम पर वे आज भी 20 से 25 किलोमीटर तक आसानी से साइकिल चला लेते हैं। उनकी तंदुरुस्ती का मुख्य राज यही मिलेट्स हैं। गांव की ही धनवतिया बैगा बताती हैं कि उन्होंने झुंझरु, पैलहाई, बरबट्टी, मक्का, कोदो, कुटकी, कागुन, भदैला कुटकी और सऊटहा कुटकी जैसी फसलें बो रखी हैं। उनके अनुसार यदि कभी किसी बीज की जरूरत पड़े तो वह आसपास के पहाड़ी गांवों में आसानी से मिल जाता है।

🍲 साल भर घरों में बनता है शुद्ध पारंपरिक भोजन

भोल्ली सिंह, धनवतिया बैगा और बेरमतिया बैगा का कहना है कि वे जितने भी प्रकार के अनाजों की खेती करते हैं—चाहे वह धान की देसी वैरायटी हो या मोटे अनाज की विभिन्न किस्में—उन सबका भंडारण वे अपने घरों में साल भर के लिए करते हैं। उनके परिवार के लोग रोजाना इसी से बना भोजन करते हैं। आदिवासियों का अटूट विश्वास है कि यह भोजन पूरी तरह से रसायन-मुक्त और शुद्ध होता है, जिसमें किसी भी प्रकार की मिलावट नहीं होती। यही कारण है कि वे आधुनिक दौर में भी अपनी पारंपरिक खेती को नहीं छोड़ रहे हैं और आने वाली पीढ़ी के लिए बीजों का संरक्षण कर रहे हैं।

🔬 कृषि वैज्ञानिक बोले: आदिवासी अंचल में हो रहा है अनमोल बीजों का संरक्षण

प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. बीके प्रजापति बताते हैं कि यह पूरा जिला आदिवासी बहुल है, जहां 45 प्रतिशत से अधिक जनजातीय आबादी कृषि कार्यों से जुड़ी है। मजगवां गांव में बैगा और भूमिया जनजाति के लोग प्राचीन काल से चले आ रहे मोटे अनाजों (जिसे अब 'श्री अन्न' कहा जाता है) की विभिन्न किस्मों की खेती कर रहे हैं और कई विलुप्त होती प्रजातियों को बचाए हुए हैं। डॉ. प्रजापति के अनुसार, आधुनिक खेती में हाइब्रिड बीजों का चलन बहुत बढ़ गया है, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में इनका उपयोग नगण्य है। यही वजह है कि ये लोग प्राकृतिक रूप से बीजों के संरक्षण में देश के लिए मिसाल पेश कर रहे हैं।

🩺 मोटे अनाज खाने के चमत्कारिक स्वास्थ्य लाभ

कृषि वैज्ञानिक डॉ. बीके प्रजापति बताते हैं कि आदिवासियों की बेहतरीन सेहत का मुख्य रहस्य मिलेट्स का सेवन है। मोटे अनाजों में भरपूर मात्रा में डाइटरी फाइबर, विटामिन्स और खनिज तत्व पाए जाते हैं। उच्च फाइबर होने के कारण यह पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है और कब्ज जैसी समस्याओं से राहत दिलाता है। मिलेट्स का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे ये शरीर में धीरे-धीरे पचते हैं और ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित रखते हैं। इसके अलावा, एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होने के कारण यह खराब कोलेस्ट्रॉल को घटाता है, पेट को लंबे समय तक भरा रखता है, वजन नियंत्रित करता है और हड्डियों को मजबूत बनाता है।

🌾 रागी, समा और कुटकी की प्रमुख किस्में

डॉ. प्रजापति के अनुसार, रागी मुख्य रूप से 3 प्रकार की होती है—लाल दाने वाली, सफेद दाने वाली और पीले दाने वाली। इसी तरह समा चावल भी रोझिन, मुटका समा और सफेद दाने वाली बेलकी किस्मों में पाया जाता है। कुटकी की बात करें तो बेमेरहा कुटकी (3-4 फीट ऊंचा पौधा, अधिक दाने), जाली कुटकी (खुली बालियां), छोटाही कुटकी (काले दाने), भदैली कुटकी (भादो में कटने वाली) और कार्तिक माह में बोई जाने वाली कुटकी प्रमुख रूप से उगाई जाती हैं।

🌿 कोदो, दाल और ज्वार की विविधता

कोदो की चार से पांच किस्मों में लेदरी कोदो (नीचे की ओर दाने), बासिन कोदो (तने व पत्तियों में छिपी बालियां) और कोदैली कोदो (लेट बुवाई व सूखे के समय उपयोगी) शामिल हैं। इसके अलावा दलहनी फसलों में हरियरा उर्दा (हरे रंग का), पसनी (हरे दाने वाली दाल), तीन किस्मों का कागुन (लाल, काला और सफेद) तथा दो किस्मों की ज्वार—मिलो (लाल दाने, रोटी के लिए) और पैलहाई (सफेद दाने, लाई-मुर्रा के रूप में भूनकर खाने के लिए) की खेती की जाती है।

✨ धान की पारंपरिक किस्मों के सेवन के विशेष फायदे

डॉ. प्रजापति बताते हैं कि धान की पारंपरिक किस्मों में आयरन, जिंक, मैग्नीशियम, कैल्शियम और विटामिन्स प्रचुर मात्रा में होते हैं। फाइबर से भरपूर होने के कारण ये धीरे-धीरे पचती हैं, जिससे शुगर अचानक नहीं बढ़ती और यह डायबिटीज के मरीजों के लिए वरदान साबित होती है। इनमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स और जिंक रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाते हैं और आंतों के स्वास्थ्य को सुधारते हैं।

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