जंगलों के अलावा खेत भी निभा रहे हैं बड़ा रोल, सैटेलाइट डेटा से सामने आया कार्बन का गणित

IISER भोपाल और मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के शोध के मुताबिक, भारत की जमीन हर साल 38 से 53 करोड़ टन कार्बन सोख रही है। बैतूल के आंकड़ों से इसकी पुष्टि हुई है।

Sep 26, 2026 - 20:18
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जंगलों के अलावा खेत भी निभा रहे हैं बड़ा रोल, सैटेलाइट डेटा से सामने आया कार्बन का गणित

भोपाल: भारत की धरती वातावरण से कितना कार्बन अवशोषित कर रही है, इसका अंदाजा अब सिर्फ जंगलों को देखकर नहीं, बल्कि आसमान से मिले उपग्रह आंकड़ों से भी लगाया जा रहा है। साल 2012 से 2020 तक के उपग्रह आंकड़ों के विश्लेषण में यह सामने आया है कि भारत की जमीन हर साल करीब 38 से 53 करोड़ टन कार्बन को वातावरण से सोख रही थी। देश की यह जमीन एक बड़े प्राकृतिक कार्बन बैंक की तरह बेहद प्रभावी रूप से काम कर रही है। खास बात यह है कि इस वैज्ञानिक गणना को मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में जमीन पर जुटाए गए वास्तविक आंकड़ों से भी परखा गया, जहां मौसम बदलने के साथ कार्बन सोखने और छोड़ने का पूरा पैटर्न बदलता हुआ मिला।

🔬 IISER भोपाल और जर्मन वैज्ञानिकों की रिसर्च में हुआ धरती के कार्बन निगलने का खुलासा

धरती कितना कार्बन निगल रही है, इसे लेकर भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) भोपाल और मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर बायोजियोकेमिस्ट्री, जर्मनी के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण शोध किया है। इस रिसर्च टीम में अपर्णा रवि, धन्यलक्ष्मी पिल्लई, क्रिस्टॉफ गर्बिग, स्टीफन सिच, सोन्के जेहले, विष्णु तिलकन, चंद्र शेखर झा और थारा अन्ना मैथ्यू शामिल हैं। शोध में सामने आया है कि भारत में हर साल 53 करोड़ टन तक कार्बन का अवशोषण धरती द्वारा किया जा रहा है। साल 2012 से 2020 तक सैटेलाइट डेटा के जरिए भारत के कार्बन फ्लक्स का सटीक आकलन किया गया। अध्ययन के अनुसार, देश के 68.2 प्रतिशत भू-भाग पर क्रोपलैंड यानी फसलों के साथ-साथ घने जंगल भी बड़े पैमाने पर कार्बन सोख रहे हैं। मध्य प्रदेश के बैतूल में जमीनी आंकड़ों के माध्यम से इस मॉडल की पूरी जांच की गई।

🌱 जंगलों के अलावा खेत क्यों सोख रहे हैं ज्यादा कार्बन?

इस मामले में शोध से जुड़ीं IISER भोपाल की वैज्ञानिक धन्यलक्ष्मी पिल्लई के अनुसार, भारत के कार्बन चक्र में सिर्फ जंगलों की ही भूमिका नहीं है, बल्कि अध्ययन से यह भी पता चला है कि जिस भारतीय भू-भाग का विश्लेषण किया गया, उसमें करीब 68.2 प्रतिशत हिस्सा अकेले खेती का क्षेत्र है। इसके बाद 16.7 प्रतिशत हिस्सा झाड़ीदार क्षेत्र, 4.8 प्रतिशत सदाबहार वन, 4.4 प्रतिशत पर्णपाती वन, 3.7 प्रतिशत मिश्रित वन, 1.73 प्रतिशत घासभूमि और 0.47 प्रतिशत हिस्सा सवाना का शामिल है। फसलें प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के जरिए वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड खींचकर उसे पौधों के जैविक पदार्थ में बदल देती हैं। वहीं, पौधों और मिट्टी की श्वसन प्रक्रिया से कुछ मात्रा में कार्बन वापस वातावरण में भी पहुंचता है। इन दोनों प्रक्रियाओं के आपसी अंतर से यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र कुल मिलाकर कार्बन सोख रहा है या वातावरण में छोड़ रहा है।

🛰️ उपग्रहों ने सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि पौधों की 'सांसे' तक पढ़ीं

इस विस्तृत अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने नासा (NASA) के 'मोडिस' समेत कई आधुनिक उपग्रह आधारित आंकड़ों का भरपूर इस्तेमाल किया। इनमें वनस्पति की स्थिति, जमीन की नमी और तापमान जैसी अहम जानकारियां शामिल थीं। यह संकेत पौधों की प्रकाश संश्लेषण गतिविधि के बारे में सटीक जानकारी प्रदान करता है। इससे यह पता चलता है कि किसी विशेष इलाके की वनस्पति वास्तव में कितनी सक्रिय है और वातावरण से कार्बन खींचने की प्रक्रिया वहां कितनी तेज गति से चल रही है।

🌤️ हर मौसम के साथ बदल रहा है कार्बन का पूरा गणित

इस अध्ययन में करीब 5 डिग्री उत्तर से 40 डिग्री उत्तर अक्षांश और 66 डिग्री पूर्व से 100 डिग्री पूर्व देशांतर के बीच आने वाले संपूर्ण भारतीय क्षेत्र का विश्लेषण किया गया। साल 2012 से 2020 के दौरान जमीन और वातावरण के बीच कार्बन के आदान-प्रदान का समय और स्थान के हिसाब से विस्तृत अनुमान लगाया गया। इस दौरान भारत की वनस्पतियों की कुल प्राथमिक उत्पादकता सालाना करीब 3.39 से 3.88 पेटाग्राम कार्बन रही, जबकि शुद्ध पारिस्थितिकी तंत्र कार्बन विनिमय माइनस 0.38 से माइनस 0.53 पेटाग्राम कार्बन प्रति वर्ष दर्ज किया गया। यहां 'माइनस' चिन्ह का सीधा मतलब यह है कि जमीन वातावरण से कार्बन को अधिक मात्रा में सोख रही थी।

📍 बैतूल में किए गए अध्ययन से खुला एक और बड़ा राज

इस पूरे शोध में मध्य प्रदेश का बैतूल जिला इसलिए भी बेहद खास रहा क्योंकि यहां जमीन पर वास्तविक कार्बन प्रवाह के जमीनी आंकड़े जुटाए गए। इसके लिए वायु और जमीन के बीच कार्बन के आदान-प्रदान को मापने वाली अत्याधुनिक 'एडी कोवेरेंस तकनीक' का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद इन सभी आंकड़ों की तुलना उपग्रह आधारित मॉडल के अनुमान से की गई। इसके अनुसार, बैतूल में मार्च से जून के दौरान शुद्ध कार्बन विनिमय सकारात्मक रहा, यानी इस अवधि में जमीन से वातावरण की ओर कार्बन का प्रवाह ज्यादा था। इसके बाद जुलाई से फरवरी तक स्थिति पूरी तरह बदल गई और जमीन ने वातावरण से अधिक कार्बन सोख लिया।

🌳 कार्बन सोखने के लिए जंगलों के अलावा कृषि और मिट्टी भी हैं बड़े विकल्प

बैतूल के आंकड़ों से तुलना करने पर उपग्रह आधारित मॉडल ने मौसम के साथ होने वाले बदलाव को काफी हद तक सटीक रूप से पकड़ लिया। मासिक स्तर पर शुद्ध कार्बन विनिमय के लिए दोनों आंकड़ों के बीच संबंध का मान 0.59, जबकि पौधों की कुल प्राथमिक उत्पादकता के मामले में यह 0.71 दर्ज किया गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, भारत जैसे विशाल देश में हर एक खेत, जंगल और घासभूमि पर कार्बन मापने के उपकरण लगाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। ऐसे में उपग्रह इस कमी को आसानी से पूरा कर सकते हैं। यह अध्ययन यह भी साबित करता है कि भारत का कार्बन भंडार केवल जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती, मिट्टी, तापमान, नमी और बदलता मौसम भी यह तय करते हैं कि जमीन कब ज्यादा कार्बन सोखेगी और कब वातावरण में ज्यादा कार्बन छोड़ेगी।

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