UPI पेमेंट चार्ज मामले में SC का अंतरिम रोक लगाने से इनकार, केंद्र सरकार और NPCI को नोटिस जारी
सुप्रीम कोर्ट ने UPI के चुनिंदा व्यापारी भुगतानों पर चार्ज लगाने के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है, लेकिन केंद्र और NPCI को नोटिस जारी किया है।
यूपीआई (UPI) के जरिए होने वाले चुनिंदा मर्चेंट या व्यापारी भुगतानों पर अतिरिक्त चार्ज लगाए जाने के मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल किसी भी तरह की तत्काल रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। हालांकि, इस महत्वपूर्ण कानूनी मामले पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी और एनपीसीआई (NPCI) सहित सभी संबंधित पक्षों को औपचारिक नोटिस जारी कर दिया है। अदालत ने इन सभी पक्षों से चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। वर्तमान में इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली विशेष पीठ द्वारा की जा रही है। दायर की गई इस याचिका में 2,000 रुपए से अधिक के चुनिंदा व्यापारी भुगतानों पर लागू किए गए नए मर्चेंट शुल्क की कानूनी वैधता को कड़ी चुनौती दी गई है।
🏛️ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार का पक्ष: ASG एन. वेंकटरमन बोले- '96% ट्रांजैक्शन पर नहीं लगेगा कोई चार्ज'
CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की गरिमामयी बेंच आज अधिवक्ता अंजन दत्ता द्वारा दाखिल की गई एक रिट याचिका पर विस्तार से सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पैरवी कर रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एन. वेंकटरमन ने अदालत को अवगत कराया कि ये नए चार्ज आगामी 15 अक्टूबर से लागू होंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के लगभग 96 प्रतिशत डिजिटल ट्रांजैक्शन पर इस शुल्क का कोई असर नहीं पड़ेगा और आवश्यक सेवाओं के मामले में चार्ज की अधिकतम सीमा महज 5 रुपए तय की गई है।
💬 'यह न तो टैक्स है और न ही कोई फीस': कोर्ट के तीखे सवालों पर सरकार की सफाई
ASG एन. वेंकटरमन ने अदालत में दो टूक शब्दों में कहा कि यह किसी भी प्रकार का टैक्स या फीस नहीं है। इस पर टिप्पणी करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा, ‘हमें यह तमाम तथ्य विधिवत हलफनामे (Affidavit) पर चाहिए... यह मामला ज्यादातर एक तकनीकी प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।’ वहीं पीठ के अन्य सदस्य जस्टिस बागची ने सवाल किया, ‘क्या यह कोई कर (Tax) है या शुल्क (Fee)? यदि यह कोई फीस नहीं है, तो इस प्रकार की वसूली का प्रशासनिक और कानूनी आधार क्या है? इसमें कौन सी विशेष सेवा प्रदान की जा रही है?’ इसके जवाब में ASG एन. वेंकटरमन ने साफ किया कि, ‘यह किसी तरह की वसूली नहीं है।’ उन्होंने आगे समझाया कि भारत सरकार इन तय चार्जेज़ से एक रुपया भी अपनी जेब में नहीं ले रही है, बल्कि यह पेमेंट एग्रीगेटर्स और बैंकों के बीच होने वाला एक आपसी सेटलमेंट शुल्क है। एएसजी ने समझाया कि जब बैंक इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन करते हैं तो परिचालन लागत आती है, और पारंपरिक तौर पर क्रेडिट या डेबिट कार्ड से भुगतान पर हमेशा से चार्ज लगते रहे हैं, जबकि शुरुआती दौर में यूपीआई भुगतानों को उन सभी शुल्कों से पूरी तरह छूट दी गई थी। हालांकि, पूरे भुगतान तंत्र को सुचारू और सुरक्षित बनाए रखने के लिए इस तरह के न्यूनतम चार्ज जरूरी हैं।
🔍 क्या है पूरा मामला? 2,000 रुपए से अधिक के मर्चेंट पेमेंट पर 0.4% तक का MDR निर्धारित
गौरतलब है कि नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने आगामी 15 अक्टूबर से यूपीआई के जरिए होने वाले कुछ चुनिंदा व्यापारी भुगतानों पर चार्ज यानी एमडीआर (MDR) की व्यवस्था को फिर से लागू करने का निर्णय लिया है। इसके तहत 2,000 रुपए से अधिक के भुगतानों पर 0.4 प्रतिशत का शुल्क निर्धारित किया गया है, जबकि 75,000 रुपए या उससे अधिक के भुगतान पर इसकी अधिकतम सीमा 300 रुपए तय की गई है। हालांकि, आम नागरिकों के बीच आपस में होने वाले सामान्य यूपीआई भुगतानों को इस दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है और उन पर कोई चार्ज नहीं लगाया गया है। सरकार का यह भी दावा है कि देश के करीब 96 प्रतिशत छोटे व्यापारी इस बदलाव से पूरी तरह अप्रभावित रहेंगे।
🟢 छोटे दुकानदारों और आवश्यक सेवाओं को दी गई है विशेष राहत
इस नई और संशोधित व्यवस्था में देश के छोटे दुकानदारों के लिए भी चार्ज से छूट का विशेष प्रावधान किया गया है। इसके तहत यूपीआई क्यूआर कोड के माध्यम से हर महीने एक लाख रुपए तक का कुल भुगतान प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को किसी भी प्रकार का कोई चार्ज नहीं देना होगा। इसके अलावा रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि से जुड़े इनपुट जैसे चुनिंदा क्षेत्रों में 2,000 रुपए से अधिक के लेन-देन पर केवल पांच रुपए का एक निश्चित शुल्क निर्धारित किया गया है।
⚖️ याचिका में क्या दी गई है मुख्य चुनौती? पारदर्शिता और कानूनी सुरक्षा पर उठाए गए सवाल
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचाई गई इस जनहित याचिका में मुख्य रूप से यह आरोप लगाया गया है कि 2,000 रुपए से अधिक के यूपीआई व्यापारी भुगतानों पर अचानक चार्ज लगाने का यह निर्णय बिना किसी पर्याप्त कानूनी सुरक्षा, प्रशासनिक पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के जल्दबाजी में लिया गया है। याचिका में केंद्र सरकार के उस नीतिगत निर्णय को चुनौती दी गई है जिसके तहत जनवरी 2020 से देश भर में सफलतापूर्वक लागू शून्य-शुल्क (Zero-fee) व्यवस्था में बदलाव किया गया है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस व्यवस्था पर किसी भी प्रकार की अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है और सभी पक्षों से तय समयसीमा में जवाब तलब किया है, यानी 15 अक्टूबर से लागू होने वाली इस नई व्यवस्था पर फिलहाल अदालत का कोई स्थगन आदेश नहीं है।
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