धान के कटोरे में भूरा माहू और नेक ब्लास्ट का कहर, फसलें पीली पड़ने से किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें
बालाघाट में धान की फसल पर भूरा माहू और नेक ब्लास्ट का भयंकर प्रकोप देखने को मिल रहा है, जिससे 60% तक फसल प्रभावित हुई है और किसान चिंतित हैं।
मध्य प्रदेश में धान की खेती के मामले में नंबर वन कहलाने वाले बालाघाट जिले में इस बार अन्नदाताओं की हालत बेहद खराब नजर आ रही है। दरअसल, इस सीजन में खेतों में लहलहाती धान की फसल विभिन्न खतरनाक बीमारियों और कीटों के प्रकोप से बुरी तरह झुलसी हुई दिखाई दे रही है। शुरुआती दौर से ही धान की फसल में कीट-व्याधियों का भारी प्रकोप देखने को मिला, जिसकी वजह से कई इलाकों में पौधे अपनी पर्याप्त ग्रोथ (विकास) भी नहीं कर पा रहे हैं। अपनी मेहनत की फसल को बर्बाद होते देख अबकी बार किसानों के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खिंच गई हैं। किसानों का दर्द है कि महंगे दामों पर खाद-बीज खरीदने और खेती की लगातार बढ़ती लागत से वे पहले ही आर्थिक रूप से परेशान थे, ऊपर से इन बीमारियों के प्रकोप ने उनके लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है।
🐛 खेतों में पीली पड़कर सूखने लगी धान की फसल: भूरा माहू कीट बना अन्नदाता के लिए महामारी
इस साल बालाघाट के खेतों में धान की फसलों पर 'भूरा माहू' (Brown Planthopper) का अत्यधिक प्रकोप देखने को मिल रहा है, जिसके कारण हरी-भरी फसल अचानक पीली पड़ने लगी है और पौधे धीरे-धीरे झुलसकर सूखने की कगार पर पहुंच चुके हैं। भूरा माहू मुख्य रूप से धान के पौधों की जड़ों में हमला करता है, जिससे पौधा धीरे-धीरे पीला पड़कर नष्ट होने लगता है। इस खतरनाक रोग के लग जाने के बाद पौधे में धान की बाली निकलने की क्षमता पूरी तरह समाप्त हो जाती है। कृषि जानकारों के मुताबिक, लगातार खराब और नमी वाले मौसम के कारण यह कीट तेजी से पनपता है। जिले में बीते एक महीने से अधिक समय तक लगातार बारिश का दौर जारी रहा, जिसके चलते पौधों को न तो पर्याप्त धूप मिल पाई और न ही ठंडक, और नाजुक अवस्था में होने के कारण उन्हें कीट-व्याधियों ने अपनी चपेट में ले लिया।
📉 50 से 60 प्रतिशत तक धान की फसल प्रभावित, महंगी दवाइयों के छिड़काव के बाद भी राहत नहीं
मौजूदा हालात यह हैं कि बालाघाट जिले के तमाम किसानों के खेतों में लगभग 50 से 60 प्रतिशत तक धान की फसल भूरा माहू के प्रकोप से पीली पड़ चुकी है। हालांकि, किसानों द्वारा कृषि विभाग के दिशा-निर्देशों के अनुसार लगातार दवाइयों का छिड़काव भी किया जा रहा है, लेकिन फसलों की सेहत में कोई खास सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। किसानों का कहना है कि यदि दवाइयों के छिड़काव से कीटों पर नियंत्रण पा भी लिया जाए, तब भी इस बीमारी के कारण फसल के कुल उत्पादन में भारी गिरावट आना तय है। ग्राम अरंडिया के किसान अशोक कटरे ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अब तक फसल पर पांच बार दवाइयों का स्प्रे कर दिया है, फिर भी खेतों में पीलापन कम नहीं हो रहा है और प्रभावित क्षेत्रों में पौधे बौने रह गए हैं। उन्होंने कहा कि महंगे खाद-बीज के साथ-साथ अब दवाइयों के आसमान छूते दामों ने किसानों की कमर तोड़ दी है।
🦠 नेक ब्लास्ट रोग ने भी बढ़ाई चिंता: अंदर ही अंदर कुतर जाती है धान की बाली
भूरा माहू के अलावा कुछ इलाकों के खेतों में 'नेक ब्लास्ट' (Neck Blast) नामक फंगस का गंभीर असर भी देखने को मिल रहा है। इस रोग में धान के पौधों के तने के अंदर कीड़ा लग जाता है, जो अंदर से विकसित होने वाली धान की बाली को काटकर अलग कर देता है। इसकी वजह से निकलने वाली बालियां पूरी तरह सफेद और खोखली रह जाती हैं, यानी बाली के अंदर दूध नहीं भर पाता और चावल की जगह केवल फली ही बच जाती है। शुरुआती दौर में इस बीमारी का पता नहीं चल पाता, लेकिन जब बालियां सफेद होने लगती हैं तब असल नुकसान का अंदाजा होता है। समय रहते कीटनाशकों का प्रयोग कर इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है, लेकिन यह किसानों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन गया है।
🔬 कृषि उपसंचालक राजेश खोब्रागढ़े की किसानों को सलाह: जैविक और प्राकृतिक उपायों अपनाने पर जोर
इस पूरे गंभीर मामले पर जिला उप संचालक कृषि राजेश खोब्रागढ़े ने जानकारी देते हुए बताया कि विभागीय अमले द्वारा मैदानी स्तर पर किए गए भ्रमण के दौरान यह पाया गया है कि खेतों में माहू का प्रकोप बड़े पैमाने पर फैला है, जिससे फसलें पीली और झुलसी हुई नजर आ रही हैं। इसके समाधान के लिए उन्होंने किसानों को नीमअस्त्र, ब्रह्मास्त्र और अग्नीअस्त्र जैसी जैविक व प्राकृतिक दवाइयों के उपयोग की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि अग्नीअस्त्र में गौमूत्र के साथ हरी मिर्च, अदरक और लहसुन का पेस्ट मिलाकर स्प्रे करने से कीटों का सफाया किया जा सकता है। इसके अलावा 'पायरोमेट्राजीन' जैसी रासायनिक दवाइयां भी इसके नियंत्रण में असरदार हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक खराब रहे मौसम, फसल चक्र (Crop Rotation) न अपनाने और यूरिया के अत्यधिक उपयोग के कारण इन बीमारियों का प्रकोप तेजी से बढ़ा है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)