गणेश उत्सव और नवरात्रि के लिए मूर्तियां बना रहीं महिलाएं, आत्मनिर्भरता की अनूठी दास्तान
छिंदवाड़ा में महिलाएं गणेश उत्सव और नवरात्रि के लिए खुद अपने हाथों से मूर्तियां बना रही हैं। पुश्तैनी हुनर को अपनाकर वे आत्मनिर्भर बन रही हैं।
समय के साथ समाज की सोच और काम करने के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आया है। कभी केवल पुरुषों तक सीमित रहने वाला मूर्तिकला का यह कार्य अब महिलाओं ने भी अपने हाथों में थाम लिया है। छिंदवाड़ा में गणेश उत्सव और नवरात्रि जैसे बड़े त्योहारों के लिए अब महिलाएं मिट्टी लाने से लेकर सुंदर आकृतियां गढ़ने तक की पूरी प्रक्रिया खुद बखूबी निभा रही हैं। जहां कई परिवार इस पुश्तैनी काम को मिलकर आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं कई महिलाएं अकेले ही इस हुनर के दम पर अपने परिवार की आर्थिक कमान संभाल रही हैं।
💪 पति के निधन के बाद रामकली ने संभाली जिम्मेदारी, मिट्टी के हुनर से चला रही हैं घर का पूरा खर्च
मूर्तिकार रामकली की कहानी संघर्ष और हौसले की एक मिसाल है। वर्ष 2018 में पति के निधन के बाद उनके कंधों पर दोनों बच्चों की जिम्मेदारी आ गई थी। ऐसे मुश्किल वक्त में उन्होंने हार नहीं मानी और पति से सीखे हुए हुनर को ही अपनी आजीविका का जरिया बना लिया। आज वे खुद मूर्तियां बनाती हैं और उनके बच्चे भी इस काम में पूरा सहयोग करते हैं। रामकली बताती हैं कि गणेश उत्सव और नवरात्रि के दौरान होने वाली बिक्री से उन्हें पूरे साल का खर्च चलाने में मदद मिलती है, हालांकि बढ़ती महंगाई से कुछ चुनौतियां जरूर आती हैं।
👩🎨 देवकी मालवी और अन्य परिवार मिलकर बढ़ा रहे हैं पुश्तैनी काम, बाहर जाने की जरूरत नहीं
एक अन्य मूर्तिकार देवकी मालवी बताती हैं कि उन्होंने शादी के बाद परिवार में ही यह कला सीखी और आज वे अपने पति व बेटी के साथ मिलकर सुंदर मूर्तियां तैयार करती हैं। इस पारंपरिक काम से उन्हें अच्छा मुनाफा हो रहा है और वे पूरी तरह आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। मोहन पेंटर जैसे अनुभवी मूर्तिकार भी मानते हैं कि पहले काम का दबाव अधिक होता था, लेकिन अब परिवार की महिलाओं और बच्चों के साथ मिलकर काम करने से समय पर मूर्तियां तैयार हो जाती हैं और आजीविका भी सुचारू रूप से चलती है।
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