मालवा में अनोखी परंपरा, दशहरे पर घर-घर खाए जाते हैं गिलकी के पकौड़े, जानिए इसके पीछे की दिलचस्प वजह
इंदौर और मालवांचल में दशहरे पर गिलकी के पकौड़े खाने की है अनोखी परंपरा। रावण दहन के बाद बुराई से दूर रहने के लिए खाए जाते हैं भजिए।
इंदौर। देश भर में विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है, लेकिन मालवांचल (इंदौर) में इस पर्व से जुड़ी एक बेहद अनूठी और दिलचस्प खान-पान की परंपरा है। यहां दशहरे के दिन घरों में विशेष रूप से गिलकी के पकौड़े (भजिए) बनाए और खाए जाते हैं। लोक मान्यता के अनुसार, जो लोग इस दिन गिलकी के पकौड़े खा लेते हैं, उन्हें सात्विकता का प्रतीक माना जाता है और ऐसा विश्वास है कि वे बुराई और असत्य के प्रभाव से दूर रहते हैं। यही वजह है कि रावण दहन के बाद जब लोग अपने घरों को लौटते हैं, तो इस परंपरा का निर्वहन करते हुए गर्मा-गरम गिलकी के पकौड़ों का आनंद लेते हैं और कई जगहों पर सामूहिक भजिया उत्सव भी आयोजित किए जाते हैं।
💰 दशहरे पर बढ़ जाती है गिलकी की मांग, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी है बेहद फायदेमंद
दशहरे के पावन पर्व पर गिलकी की मांग इतनी बढ़ जाती है कि सामान्य दिनों में 50-60 रुपये प्रति किलो बिकने वाली यह सब्जी त्योहार के समय 80 से 100 रुपये किलो तक पहुंच जाती है। संस्था सूर्य मंच के सनी पठारे ने बताया कि इस बार रावण दहन स्थल पर ही 151 किलो गिलकी के भजिए तैयार कर लोगों को बांटे जाएंगे ताकि लोग बुराइयों से दूर रहने का संकल्प लें। इसके अलावा, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इस परंपरा का बड़ा महत्व है; नवरात्रि के उपवास के बाद शरीर में बढ़ा हुआ पित्त शांत करने और मानसून के बाद सर्दियों की शुरुआत में ताजी हरी सब्जी के सेवन से पाचन तंत्र व आंतों को स्वस्थ रखने में गिलकी बेहद गुणकारी मानी जाती है।
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