करोड़ों के बजट के बाद भी बड़वानी में आदिवासी विद्यार्थियों का हाल बेहाल; कौन तय करेगा जवाबदेही?
बड़वानी जिले के आदिवासी छात्रावासों में सुविधाओं के अभाव और अव्यवस्थाओं से छात्र-छात्राएं परेशान हैं। नियमित निरीक्षण और स्थायी समाधान की उठी मांग। पढ़ें विशेष रिपोर्ट।
बड़वानी : बड़वानी जिला आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के कारण शिक्षा के क्षेत्र में विशेष महत्व रखता है। यहाँ हजारों आदिवासी परिवार अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद के साथ उन्हें शासकीय छात्रावासों और विद्यालयों में भेजते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण इन परिवारों के पास निजी विद्यालयों और आवासीय संस्थानों का विकल्प नहीं होता। ऐसे में सरकारी छात्रावास और विद्यालय ही उनके बच्चों के सपनों का आधार बनते हैं। लेकिन जब यही संस्थान सुविधाओं के अभाव और अव्यवस्थाओं के केंद्र बन जाएँ, तो चिंता स्वाभाविक है।
पिछले कुछ समय से बड़वानी जिले के विभिन्न आदिवासी छात्रावासों के छात्र-छात्राएँ अपनी समस्याओं को लेकर बार-बार प्रशासन के दरवाजे खटखटाने को मजबूर हुए हैं। कभी भोजन की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आती हैं, कभी पेयजल, स्वच्छता, बिजली या अन्य मूलभूत सुविधाओं की कमी को लेकर विद्यार्थियों को आवाज उठानी पड़ती है। कई बार तो छात्रावासों से निकलकर विद्यार्थियों को जिला कलेक्टर कार्यालय तक जाना पड़ा है। यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल किसी एक छात्रावास तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवस्था के भीतर कहीं न कहीं गंभीर खामियाँ मौजूद हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, तब जिम्मेदारी किसकी तय की जा रही है? यदि विद्यार्थियों को अपनी बात सुनाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़े, तो यह प्रशासनिक तंत्र की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़ा करता है। शासन द्वारा शिक्षा और छात्रावासों के लिए हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। विभिन्न योजनाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं। इसके बावजूद यदि जमीनी स्तर पर विद्यार्थी परेशान हैं, तो यह आवश्यक हो जाता है कि खर्च और परिणामों के बीच के अंतर को गंभीरता से समझा जाए।
शिक्षा केवल किताबों और परीक्षाओं तक सीमित नहीं होती। एक विद्यार्थी को बेहतर वातावरण, सुरक्षित आवास, पौष्टिक भोजन, स्वच्छ परिसर और अध्ययन के अनुकूल सुविधाओं की भी आवश्यकता होती है। यदि इन मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होगी, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य अधूरा रह जाएगा। आदिवासी अंचलों के विद्यार्थियों के लिए तो यह और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे पहले से ही सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे होते हैं।
आज आवश्यकता केवल समस्याओं को सुनने की नहीं, बल्कि उनके स्थायी समाधान की है। छात्रावासों का नियमित निरीक्षण हो, शिकायतों की निष्पक्ष जांच हो और जहाँ भी लापरवाही मिले वहाँ जवाबदेही तय की जाए। विद्यार्थियों की समस्याओं को आंदोलन या विरोध का विषय बनने से पहले ही हल किया जाना चाहिए। आखिरकार, शिक्षा किसी भी समाज के विकास की नींव होती है और उस नींव को कमजोर करने की अनुमति किसी भी परिस्थिति में नहीं दी जा सकती।
बड़वानी के आदिवासी विद्यार्थियों को दया नहीं, अधिकार चाहिए; आश्वासन नहीं, व्यवस्था चाहिए; और घोषणाएँ नहीं, परिणाम चाहिए। यदि हम वास्तव में आदिवासी समाज के विकास और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, तो छात्रावासों और विद्यालयों की स्थिति में सुधार को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। क्योंकि इन छात्रावासों में रहने वाला हर विद्यार्थी केवल एक छात्र नहीं, बल्कि अपने परिवार और समाज के बेहतर भविष्य की उम्मीद है।
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