स्कूटर और ऑटो से हुआ भारी मात्रा में धान का परिवहन, सरकार और सिविल सप्लाई कारपोरेशन ने मांगी जवाब के लिए मोहलत
मध्य प्रदेश के 34 करोड़ के धान घोटाले मामले में ईओडब्लू ने हाईकोर्ट में रिपोर्ट पेश की है। सरकार ने विस्तृत जवाब के लिए 6 सप्ताह की मोहलत मांगी है।
मध्य प्रदेश के बहुचर्चित 34 करोड़ रुपये के धान घोटाले से जुड़ी एफआईआर और विस्तृत जांच रिपोर्ट आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में पेश कर दी गई है। हालांकि, हाईकोर्ट के कड़े आदेश के डेढ़ महीने बाद भी राज्य सरकार और नागरिक आपूर्ति निगम (सिविल सप्लाई कॉरपोरेशन) अपना विस्तृत जवाब पूरी तरह तैयार नहीं कर सके, जिसके चलते उन्होंने अदालत से अतिरिक्त समय की मांग की। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अल्पेश वाई कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने मोहलत प्रदान करते हुए इस मामले की अगली सुनवाई अब से 6 सप्ताह बाद निर्धारित की है।
🚚 धान खरीदी और परिवहन के नाम पर हैरान करने वाला फर्जीवाड़ा, दोपहिया और तिपहिया वाहनों से दिखाया गया अनाज ढोना
मामले में 'नागरिक उपभोक्ता मंच' की तरफ से दायर जनहित याचिका में अदालत को बताया गया कि जबलपुर के तत्कालीन कलेक्टर दीपक सक्सेना के आदेश पर हुई जांच में करीब 34 करोड़ रुपये के धान घोटाले का बड़ा खुलासा हुआ था। जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि धान के उपार्जन और परिवहन के नाम पर कागजों में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा किया गया है। रिकॉर्ड में 100 से 200 क्विंटल तक भारी-भरकम धान का परिवहन स्कूटर, ऑटो और यहां तक कि यात्री बसों के जरिए होना दर्ज किया गया, जबकि तकनीकी रूप से ऐसे छोटे वाहनों से इतने बड़े पैमाने पर अनाज का परिवहन होना असंभव है।
🌐 अन्य जिलों से भी जुड़े हैं घोटाले के तार, मार्च 2025 में 145 लोगों पर दर्ज हुई थीं एफआईआर
मार्च 2025 में इस बड़े घोटाले की पुष्टि होने के बाद जबलपुर के विभिन्न थानों में कुल 145 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई थी। हाईकोर्ट में दायर याचिका में यह भी दलील दी गई कि इस घोटाले के तार केवल जबलपुर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मंडला, डिंडोरी, सिवनी और बालाघाट जैसे प्रदेश के अन्य जिलों से भी जुड़े हुए हैं। पूर्व में हुई सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई थी कि सरकार द्वारा 27 जिला कलेक्टर्स को जांच के निर्देश दिए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आए हैं, और अदालत ने पूरे प्रदेश स्तर की जांच का ब्योरा मांगा था।
🔍 विधायक अजय विश्नोई की शिकायत से उजागर हुआ था मामला, राइस मिलर्स और अधिकारियों की मिलीभगत से चल रहा था खेल
उल्लेखनीय है कि यह पूरा घोटाला सबसे पहले विधायक अजय विश्नोई की शिकायत के बाद प्रकाश में आया था। इसके बाद शुरू हुई प्रशासनिक जांच में फर्जी परिवहन के जरिए सरकारी धन की लूट की पुष्टि हुई, जिसमें राइस मिलर्स और एमपी स्टेट सिविल सप्लाई कॉरपोरेशन के कई अधिकारियों-कर्मचारियों की मिलीभगत उजागर हुई। मामले की गंभीरता को देखते हुए अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद अदालत ने अगस्त 2026 में इस जांच का दायरा बढ़ाकर पूरे मध्य प्रदेश में लागू करने के निर्देश दिए थे। वर्तमान में EOW और जिला प्रशासन इस पूरे मामले की परतें उधेड़ने में जुटे हैं।
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