क्या सांसद-विधायक पर केस वापस होने पर सह-आरोपियों को भी मिलेगा लाभ? हाईकोर्ट करेगा अहम फैसला

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सांसदों और विधायकों से जुड़े आपराधिक मुकदमों की वापसी और सह-आरोपियों को मिलने वाले लाभ से जुड़े अहम कानूनी प्रश्नों पर 4 नवंबर की सुनवाई तय की है।

Oct 29, 2026 - 11:19
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क्या सांसद-विधायक पर केस वापस होने पर सह-आरोपियों को भी मिलेगा लाभ? हाईकोर्ट करेगा अहम फैसला

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में सांसदों और विधायकों से जुड़े आपराधिक मुकदमों की निगरानी के दौरान कई अत्यंत महत्वपूर्ण और पेचीदा कानूनी सवाल सामने आए हैं।

मुख्य सवाल यह है कि यदि किसी आपराधिक मामले में सांसद या विधायक के साथ अन्य लोग भी आरोपी हैं, तो क्या मुकदमा वापसी का लाभ केवल जनप्रतिनिधि तक ही सीमित रहेगा या उनके साथ नामजद अन्य आरोपियों को भी इसका सीधा लाभ मिलेगा?

इसके साथ ही, क्या राज्य सरकार यदि किसी जनप्रतिनिधि के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमा वापस लेना चाहे, तो इस पर अंतिम निर्णय संबंधित विशेष अदालत (Special Court) करेगी या इसके लिए हाईकोर्ट की पूर्व अनुमति अनिवार्य होगी?

हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे एवं न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने इन सभी गंभीर कानूनी प्रश्नों पर विस्तृत विचार-विमर्श करने के लिए अगली सुनवाई की तिथि 4 नवंबर निर्धारित की है।

📊 प्रदेश में 15 मामले हैं लंबित, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगी अद्यतन रिपोर्ट

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रह्मदत्त सिंह ने पूर्व की स्टेटस रिपोर्ट के आधार पर अदालत को अवगत कराया कि प्रदेश में सांसदों और विधायकों से संबंधित कुल 19 आपराधिक मामले लंबित थे।

  • 3 मामलों का निस्तारण: इनमें से 3 मुकदमों का निराकरण संबंधित विशेष अदालतों द्वारा कर दिया गया है।

  • 1 मामला निरस्त: 1 मामला हाईकोर्ट द्वारा निरस्त किया जा चुका है।

  • 15 मामले वर्तमान में लंबित: इस प्रकार पिछली रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में कुल 15 आपराधिक मामले लंबित हैं।

युगलपीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इन लंबित प्रकरणों की अद्यतन (Updated) स्थिति आगामी सुनवाई से पहले अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे, ताकि मौजूदा स्थिति के आधार पर आगे विचार किया जा सके।

📜 सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हो रही है मुकदमों की निगरानी, जनहित याचिका से जुड़ा है मामला

यह पूरा मामला अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में दायर जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की अदालतों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के शीघ्र निपटारे और निगरानी के लिए सभी राज्यों के हाईकोर्ट्स को कड़े निर्देश दिए थे। इसी निर्देश के अनुपालन में 22 सितंबर 2020 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जनहित याचिका दर्ज की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य मामलों की अद्यतन स्थिति पर नजर रखना और ट्रायल की प्रक्रिया को गति देना है।

🔒 दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत केस वापसी: केवल सरकार की इच्छा ही काफी नहीं

सुनवाई के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 321 के तहत अभियोजन (Case) वापस लेने की कानूनी प्रक्रिया से जुड़े अधिकार क्षेत्र का सवाल प्रमुखता से उठा। इस प्रावधान के तहत लोक अभियोजक या सहायक लोक अभियोजक अदालत की सहमति से अभियोजन वापस लेने की अर्जी लगा सकता है।

ऐसे मामलों में केवल सरकार की इच्छा ही काफी नहीं होती, बल्कि न्यायालय की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक होती है। अब हाईकोर्ट यह तय करेगा कि सांसदों-विधायकों से संबंधित मामलों में मुकदमा वापसी की प्रक्रिया के दौरान विशेष अदालत और हाईकोर्ट के अधिकारों की विधिक सीमा किस तरह निर्धारित की जाएगी।

👥 पांच में से एक आरोपी अगर विधायक हो, तो क्या बाकी चार को भी मिलेगी राहत?

युगलपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान एक और व्यावहारिक उदाहरण आया— यदि किसी आपराधिक मामले में कुल पांच आरोपी हैं और उनमें से केवल एक व्यक्ति सांसद या विधायक है, तथा राज्य सरकार उस जनप्रतिनिधि के खिलाफ अभियोजन वापस लेना चाहती है, तो क्या इसका लाभ केवल उस नेता को मिलेगा या बाकी 4 सामान्य आरोपियों को भी मिल जाएगा?

  • वरिष्ठ अधिवक्ता की दलील: मामले में हस्तक्षेपकर्ता की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त ने दलील दी कि कानूनन मुकदमा वापसी का लाभ सभी पांचों आरोपियों को मिल सकता है।

  • अंतिम निर्णय का इंतजार: हालांकि, इस प्रश्न पर अंतिम कानूनी स्थिति मामले के विशिष्ट तथ्यों और लागू कानूनों के आधार पर ही स्पष्ट होगी। सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता संजय के. अग्रवाल, अधिवक्ता अहादुल्ला उस्मानी और रविशंकर पटेल ने भी अपना-अपना पक्ष रखा।

📅 4 नवंबर को होगी बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई

जबलपुर हाईकोर्ट में अब इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले पर 4 नवंबर को अगली सुनवाई होगी। राज्य सरकार द्वारा लंबित मुकदमों की नई स्थिति रिपोर्ट पेश किए जाने के साथ ही, मुकदमा वापसी की प्रक्रिया और संबंधित अदालतों के अधिकार क्षेत्र से जुड़े इन विधिक प्रश्नों पर गहन विचार किया जाएगा। उम्मीद है कि इस सुनवाई से जनप्रतिनिधियों के मुकदमों की वापसी से जुड़ी कानूनी स्थिति पूरी तरह से साफ हो जाएगी।

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