कचराघर बनी मोक्षदायिनी शिप्रा! पर्यावरणविदों ने कहा- 'जन जागरूकता से ही बचेगा नदियों का अस्तित्व'
उज्जैन के माधव कॉलेज में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान पर्यावरणविदों ने शिप्रा नदी का निरीक्षण कर चिंता जताई। सिंहस्थ 2028 से पहले सफाई का संकल्प लिया गया।
उज्जैन । उज्जैन की जीवनदायिनी और पौराणिक महत्व रखने वाली शिप्रा नदी की वर्तमान दुर्दशा पर पर्यावरण संरक्षण की मुहिम में जुटे वैज्ञानिकों और शोधार्थियों ने गहरी चिंता जताई है। उज्जैन के माधव महाविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान विशेषज्ञों एवं प्रोफ़ेसरों की एक विशेष टीम ने शिप्रा नदी के तटों का प्रत्यक्ष मुआयना किया।
नदी के घटते जलस्तर, किनारों पर फैले प्लास्टिक और कचरे के ढेर को देखकर पूरी टीम आहत नजर आई। निरीक्षण के दौरान वरिष्ठ पर्यावरणविदों ने कहा कि “शिप्रा नदी की स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो नदी को बुखार आ गया हो।” उन्होंने जोर देकर कहा कि इस बीमारी का इलाज केवल और केवल जन-जागरूकता अभियान के जरिए ही संभव है। विशेषज्ञों ने सवाल उठाया कि क्या नदियां कचराघर बन चुकी हैं? आगामी सिंहस्थ 2028 के आयोजन में अब समय कम ही शेष है, ऐसे में स्वच्छ और निर्बाध प्रवाहमान शिप्रा का निर्माण शासन-प्रशासन के लिए एक बेहद बड़ी चुनौती है।
🌍 5 देशों के 200 से अधिक विशेषज्ञों का समागम, 119 शोधपत्रों में मथा गया पर्यावरण का भविष्य
उज्जैन के माधव महाविद्यालय में आयोजित इस दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारत सहित 5 देशों के 200 से अधिक प्रख्यात शोधार्थी और प्रोफेसर शामिल हुए।
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प्रमुख विषय: 'सतत विकास और पारिस्थितिकी लचीलापन' (Sustainable Development and Ecological Resilience) विषय पर आयोजित इस संगोष्ठी में कुल 119 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
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चर्चा का केंद्र: संगोष्ठी के दौरान पर्यावरण संरक्षण, विज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों के सही नियोजन और 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्यों को हासिल करने पर गहन मंथन हुआ।
⚖️ प्राचार्य डॉ. कल्पना वीरेंद्र सिंह का बयान: विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बेहद जरूरी
माधव महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. कल्पना वीरेंद्र सिंह ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य बुनियादी विकास और प्रकृति संरक्षण के मध्य एक आदर्श संतुलन स्थापित करने के उपाय तलाशना है।
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हाईब्रिड मोड: यह संगोष्ठी ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से हाइब्रिड मोड में आयोजित की गई।
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नीतिगत सुझाव: प्राचार्य ने कहा कि जब हम 'विकसित भारत 2047' के तहत बुनियादी ढांचे और आर्थिक प्रगति की बात करते हैं, तो हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विकास की इस अंधी दौड़ में हमारे प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण को कोई अपूरणीय क्षति न पहुँचे। संगोष्ठी से निकले सभी व्यावहारिक निष्कर्ष मध्य प्रदेश शासन और भारत सरकार को प्रेषित किए जाएंगे।
🚫 प्रकृति शोध संस्थान उदयपुर के संस्थापक डॉ. पी.आर. व्यास ने जताई चिंता: जलधारा रोककर बस रही हैं बस्तियां
संगोष्ठी में पहुंचे 'प्रकृति शोध संस्थान उदयपुर' के संस्थापक प्रोफेसर डॉ. पी.आर. व्यास ने नदियों के अवरुद्ध हो रहे प्राकृतिक प्रवाह पर करारा प्रहार किया।
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प्राकृतिक संसाधनों का दोहन: डॉ. व्यास ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का नियोजन इस तरह होना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल और ऊर्जा सुरक्षित रहे।
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अतिक्रमण और प्रदूषण: नदियों की स्वाभाविक जलधारा को रोककर खेती करना, आवासीय बस्तियां बसाना और प्लास्टिक का कचरा फेंकना नदियों के अस्तित्व को समाप्त कर रहा है। उन्होंने मांग की कि घाटों पर डस्टबिन की नियमित व्यवस्था, सख्त सफाई और आम नागरिकों की जवाबदेही तय होना अनिवार्य है।
🧹 50 शोधार्थियों और 100 एनसीसी कैडेट्स ने उठाया बीड़ा: सिंहस्थ 2028 के लिए शिप्रा को स्वच्छ बनाने का संकल्प
संगोष्ठी के सकारात्मक परिणामों के बीच युवाओं ने धरातल पर उतरकर कार्य करने की प्रतिबद्धता जताई है। भूगोल विभाग के शोधार्थी अशीष पंवार ने कहा कि केवल बैठकों में चर्चा और शोधपत्रों से नदियां साफ नहीं होंगी, इसके लिए धरातल पर कड़े श्रम की आवश्यकता है।
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जमीनी कार्रवाई: सिंहस्थ 2028 को ध्यान में रखते हुए 50 शोधार्थी और 100 एनसीसी (NCC) कैडेट्स एक विशेष कार्यदल बनाकर शिप्रा नदी और उसके प्रमुख घाटों की सफाई का नियमित अभियान चलाएंगे और आम जनता को भी स्वच्छता आंदोलन से जोड़ेंगे।
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