सागर न्यूज़: 18वीं शताब्दी के स्वयंभू शिवलिंग में ठोकी गई थी कील! जानिए बरकोटी के प्रसिद्ध मतंगेश्वर मंदिर की महिमा
सागर के बरकोटी गांव में 23.5° कर्क रेखा पर प्रकट हुए मतंगेश्वर महादेव मंदिर की महिमा अपरंपार है। यहां पूजन का फल उज्जैन के महाकाल पूजन के समान माना जाता है।
मध्य प्रदेश के सागर जिले अंतर्गत नेशनल हाइवे 44 के समीप देवरी क्षेत्र के बरकोटी गांव में स्थित प्रसिद्ध शिव मंदिर की महिमा अपरंपार है। अपनी कई अनोखी और वैज्ञानिक-धार्मिक विशेषताओं के चलते इस प्राचीन मंदिर का पूरे बुंदेलखंड अंचल में विशेष आध्यात्मिक महत्व है। इस स्थान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां से 23.5° कर्क रेखा होकर गुजरती है। इसी कर्क रेखा पर भगवान शिव काले पत्थर के दिव्य स्वयंभू शिवलिंग के रूप में स्वयं प्रकट हुए थे। 18वीं शताब्दी में इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया था।
🧘 संत मतंग और मतंगी माता: जानिए मंदिर निर्माण और नामांकरण की पौराणिक कथा
परमहंस संत का योगदान और मां पार्वती का रूप:
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संत मतंग की प्रेरणा: मंदिर के पूज्य पुजारी पंडित वृंदावन तिवारी बताते हैं कि यह स्वयंभू प्रकट शिव जी का मंदिर है। इसका निर्माण 18वीं शताब्दी में परमहंस संत मतंग की प्रेरणा से एक नि:संतान दंपत्ति मिश्रा परिवार द्वारा कराया गया था। संत मतंग के नाम पर ही स्वयंभू महादेव को 'मतंगेश्वर महादेव' के नाम से जाना गया।
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10 विद्या वाली मतंगी माता: शिवलिंग के ठीक बगल में विराजीं 10 महाविद्याओं की ज्ञाता मां पार्वती को 'मतंगी माता' के रूप में पूजा जाता है।
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दिव्य शिव परिवार: मंदिर प्रांगण में नंदी महाराज, भगवान कार्तिकेय और भगवान श्री गणेश अपने दुर्लभ 'हेरंब रूप' में विराजमान हैं। इसके अलावा मंदिर परिसर में दक्षिणमुखी हनुमान जी महाराज भी स्थापित हैं।
🪨 तिल-तिल बढ़ रहा था स्वयंभू शिवलिंग: वृद्धि रोकने के लिए ठोकी गई थी कील
चमत्कारिक शिवलिंग का वैज्ञानिक और धार्मिक रहस्य:
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कीलिंग का निशान: मंदिर में विराजे मतंगेश्वर महादेव शिवलिंग के बारे में मान्यता है कि यह स्वयंभू शिवलिंग समय के साथ तिल-तिल करके लगातार बढ़ रहा था।
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प्राचीन नियम: पंडित वृंदावन तिवारी के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि काले पत्थर में कील ठोक देने से उसकी वृद्धि रुक जाती है। शिवलिंग की अनवरत वृद्धि को रोकने के लिए उसके ऊपर एक कील ठोकी गई थी, जिसका निशान आज भी शिवलिंग के ऊपरी हिस्से पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कील ठोकने के बाद से शिवलिंग की वृद्धि रुक गई।
🌾 मकर संक्रांति पर लगता है एक सप्ताह का विशाल मेला; मनोकामना सिद्ध धाम
धार्मिक अनुष्ठान और संक्रांति का महत्व:
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मकर संक्रांति का प्रतिनिधित्व: यह मंदिर मुख्य रूप से मकर संक्रांति का प्रतिनिधित्व करता है। यहां मकर संक्रांति के पावन अवसर पर एक सप्ताह तक चलने वाले भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इसके अतिरिक्त बसंत पंचमी और महाशिवरात्रि पर एक दिवसीय मेले का आयोजन होता है।
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संतान प्राप्ति की मनोकामना: इसे एक सिद्ध पीठ माना जाता है। खासकर नि:संतान दंपत्ति संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर यहां आते हैं और उनकी मुरादें पूरी होती हैं।
🛕 उज्जैन के महाकाल पूजन के बराबर मिलता है फल: महंत पं. केशव गिरी
कर्क रेखा का सामरिक और आध्यात्मिक महत्व:
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महाकाल जैसी महत्ता: सागर स्थित दद्दा जी मंदिर के महंत पं. केशव गिरी (जो बरकोटी मंदिर में विशेष अनुष्ठान की तैयारी कर रहे हैं) का कहना है कि जिस प्रकार उज्जैन से कर्क रेखा गुजरती है और वहां बाबा महाकाल विराजमान हैं, ठीक उसी तरह बरकोटी से भी कर्क रेखा गुजरती है और यहां मतंगेश्वर महादेव स्वयं प्रकट हुए हैं।
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महाकाल पूजन का पुण्य: बरकोटी मतंगेश्वर मंदिर में मन, वचन और कर्म से पूजा-अर्चना करने से श्रद्धालु को सीधे उज्जैन महाकाल पूजन के बराबर ही महापुण्य की प्राप्ति होती है।
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