इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने दो वरिष्ठ अधिकारियों को हटाया, ईरान में सरकार गिराने का था प्लान

इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरान में सरकार गिराने की नाकाम योजना बनाने वाले दो वरिष्ठ अधिकारियों को पद से हटा दिया है। जानिए क्या था पूरा सीक्रेट प्लान।

Aug 07, 2026 - 19:26
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इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने दो वरिष्ठ अधिकारियों को हटाया, ईरान में सरकार गिराने का था प्लान

इजराइल की कुख्यात खुफिया एजेंसी मोसाद (Mossad) के डायरेक्टर रोमन गोफमैन ने एजेंसी के दो वरिष्ठ अधिकारियों को उनके पदों से बर्खास्त कर दिया है। इजरायली मीडिया चैनल 12 न्यूज के मुताबिक, ये दोनों अधिकारी ईरान की मौजूदा सरकार को गिराने की एक बड़ी लेकिन नाकाम योजना तैयार करने में मुख्य भूमिका निभा रहे थे। हटाए गए अधिकारियों में से एक पिछले साल दिसंबर महीने से इंटेलिजेंस डायरेक्टरेट के प्रमुख के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहा था, जबकि दूसरा अधिकारी एजेंसी के बेहद संवेदनशील 'ईरान डिवीजन' को लीड कर रहा था।

🕵️‍♂️ क्या थी ईरान में सत्ता परिवर्तन की वह गुप्त योजना?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये दोनों अधिकारी उस ऑपरेशनल प्लान को तैयार करने वाली मुख्य टीम का हिस्सा थे, जिसका मुख्य उद्देश्य ईरान के अल्पसंख्यक समूहों की मदद से इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसक विरोध प्रदर्शन और विद्रोह खड़ा करना था। इस सीक्रेट योजना के तहत ईरान की सरकार को अंदर से कमजोर करने और देश में सत्ता परिवर्तन के अनुकूल हालात पैदा करने की पूरी रणनीति तैयार की गई थी।

इजरायली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसी साल फरवरी में इस्लामिक रिपब्लिक के खिलाफ युद्ध की रणनीति के सिलसिले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मनाने के दौरान इस योजना पर विस्तार से चर्चा की थी। इस पूरे प्लान में ईरानी कुर्दों की भूमिका को सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना गया था। प्रतिष्ठित अखबार 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' के अनुसार, मोसाद की इस योजना में ईरान के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित ईरान-इराक सीमा के पास इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के ठिकानों पर लक्षित इजरायली हवाई हमलों की परिकल्पना की गई थी।

🎯 इजराइल और अमेरिका को इस ऑपरेशन से क्या थी उम्मीद?

इन हमलों का मुख्य मकसद कुर्द लड़ाकों के लिए ईरान की सीमा में आसानी से दाखिल होने और देश के उत्तर-पश्चिम में स्थित कुर्द बहुल शहरों की ओर बढ़ने का सुरक्षित रास्ता तैयार करना था। मोसाद को पूरी उम्मीद थी कि इस बगावत के बाद हजारों स्थानीय युवा कुर्द लड़ाके इस मुहिम से जुड़ जाएंगे और यह देखते ही देखते एक बड़े जन-आंदोलन में बदल जाएगा, जो तेहरान तक पहुँच सकता था।

कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि इसके जरिए ईरान की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए लाखों प्रदर्शनकारियों वाले एक विशाल विरोध आंदोलन को बढ़ावा मिलने की पूरी उम्मीद थी।

🤝 महमूद अहमदीनेजाद को नया ईरानी नेता बनाने की थी साजिश

इस खतरनाक और गुप्त योजना के मुख्य हिस्सों में से एक यह भी था कि ईरान के पूर्व कट्टरपंथी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद को देश के नए ईरानी नेता के तौर पर स्थापित किया जाए। 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने अपनी एक रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया था कि इजराइल ने अहमदीनेजाद को अपने पाले में लाने के लिए कई सालों तक गुप्त प्रयास किए थे।

इस अभियान के तहत हंगरी में आयोजित एक एकेडमिक कॉन्फ्रेंस के दौरान तत्कालीन मोसाद प्रमुख डेविड बार्निया के साथ उनकी गुप्त बैठक भी शामिल थी। हालांकि, बाद में महमूद अहमदीनेजाद के कार्यालय ने इस मीडिया रिपोर्ट का कड़ा खंडन किया था।

⚔️ फरवरी की शुरुआत में ईरान पर किए गए थे ताबड़तोड़ हमले

इसी गुप्त योजना के तहत फरवरी महीने की शुरुआत में युद्ध के शुरुआती दौर में इजराइल और अमेरिका ने कुर्द लोगों के लिए जमीनी रास्ता आसान बनाने के लिए ईरान के उत्तर-पश्चिम हिस्से में जबरदस्त हमले किए थे। इन हमलों में ईरानी सुरक्षा बलों, सरकारी अधिकारियों के ठिकानों, सैन्य चौकियों, मिसाइल सिस्टम, पुलिस स्टेशनों और बासिज (Basij) साइटों को मुख्य रूप से निशाना बनाया गया था।

स्पष्ट है कि इजराइल और अमेरिका के ये व्यापक रणनीतिक लक्ष्य सिर्फ ईरान की सैन्य क्षमता को सीमित करने तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि वे देश में बड़ा राजनीतिक बदलाव लाना चाहते थे।

❌ आखिर क्यों पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया यह सीक्रेट प्लान?

चैनल 12 के खुलासे के मुताबिक, इस महत्वाकांक्षी योजना के असफल होने के पीछे सबसे बड़ी वजह दोनों वरिष्ठ अधिकारियों और वर्तमान मोसाद प्रमुख रोमन गोफमैन के बीच नीतिगत मतभेद थे।

इसके अलावा, मीडिया में इस टॉप-सीक्रेट योजना से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां लीक होने, तुर्की की तरफ से चली गई कूटनीतिक लॉबिंग और खुद कुर्द समूहों की तरफ से दिखाई गई हिचकिचाहट के चलते यह प्लान परवान नहीं चढ़ सका। इन तमाम व्यावहारिक अड़चनों के सामने आने के बाद संयुक्त रूप से अमेरिका ने भी कथित तौर पर इस प्लान को आगे बढ़ाने से अपने कदम पीछे खींच लिए, जिसके बाद यह पूरा ऑपरेशन ठंडे बस्ते में चला गया।

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