ओंकारेश्वर के बाद मध्य प्रदेश के उमरिया में बनेगा विशाल फ्लोटिंग सोलर प्लांट, खर्च होंगे 1500 करोड़
ओंकारेश्वर के बाद मध्य प्रदेश के उमरिया में संजय गांधी थर्मल पावर स्टेशन के कूलिंग पॉड में 1500 करोड़ की लागत से 220 मेगावाट का फ्लोटिंग सोलर प्लांट लगाया जाएगा।
मध्य प्रदेश अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में देश भर में तेजी से एक मिसाल बनकर उभर रहा है। दुनिया के सबसे बड़े फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट 'ओंकारेश्वर' की अपार सफलता के बाद अब प्रदेश में एक और अत्याधुनिक फ्लोटिंग सोलर प्लांट स्थापित करने की तैयारी पूरी कर ली गई है। यह नया सोलर प्लांट उमरिया जिले में स्थित प्रसिद्ध संजय गांधी थर्मल पावर स्टेशन के कूलिंग पॉड में लगाया जाएगा। पीपीपी (पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल पर आधारित इस महत्वाकांक्षी फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट पर लगभग 1500 करोड़ रुपये की लागत आएगी, जिससे करीब 220 मेगावाट बिजली का बंपर उत्पादन किया जाएगा। इस परियोजना से मिलने वाली बिजली सीधे तौर पर प्रदेश के नगरीय निकायों को दी जाएगी, जिससे स्थानीय निकायों पर बिजली बिल का आर्थिक बोझ काफी हद तक कम हो जाएगा।
⚡ थर्मल बिजली पर घटती निर्भरता और सोलर ऊर्जा में तेजी से आगे बढ़ता मध्य प्रदेश
पारंपरिक थर्मल पावर से पैदा होने वाली बिजली पर मध्य प्रदेश की निर्भरता अब लगातार कम हो रही है और राज्य सोलर ऊर्जा को बढ़ावा देने में सबसे आगे है। वर्तमान में प्रदेश में बड़े पैमाने पर सोलर ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है। ओंकारेश्वर बांध के जल स्तर पर बने फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट से पहले ही लगभग 275 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। इसी कड़ी में अब संजय गांधी थर्मल पावर स्टेशन के कूलिंग पॉड में 220 मेगावाट क्षमता का यह नया संयंत्र स्थापित किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के लिए अर्बन डेवलपमेंट कंपनी ने मध्य प्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी को नोडल एजेंसी बनाया है और जल्द ही इसके लिए टेंडर प्रक्रिया शुरू की जाएगी। नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे के अनुसार, नगरीय निकायों में कुल बिजली की डिमांड करीब 300 मेगावाट रहती है, ऐसे में यह प्रोजेक्ट शहरी निकायों के लिए बेहद मददगार साबित होगा।
🌊 कैसे काम करता है फ्लोटिंग सोलर प्लांट और रीवा-नीमच की तर्ज पर बढ़ रहा दायरा
फ्लोटिंग सोलर प्लांट की तकनीकी विशेषता यह होती है कि इसमें जमीन के बजाय पानी की सतह पर सोलर पैनल स्थापित किए जाते हैं। इसके लिए पानी के ऊपर बड़े-बड़े विशेष 'फ्लोटर्स' को आपस में जोड़कर एक मजबूत बेस तैयार किया जाता है, ताकि पानी की लहरों या हवा से पैनल प्रभावित न हों। इसके बाद अंडर-वॉटर केबलों के जरिए सोलर पैनल से बनने वाली बिजली को सीधे ग्रिड तक पहुंचाया जाता है। मध्य प्रदेश में सोलर का दायरा लगातार विस्तृत हो रहा है। रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर प्रोजेक्ट से दिल्ली मेट्रो को भी बिजली मिल रही है, वहीं नीमच और शाजापुर में स्थापित होने वाली बड़ी सोलर परियोजनाओं से देश की सबसे सस्ती 2.14 रुपये प्रति यूनिट बिजली मिलने जा रही है। इसके अलावा प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत भी प्रदेश के डेढ़ लाख से अधिक घरों पर रूफटॉप सोलर प्लांट लगाए जा चुके हैं।
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