रूपाखेड़ा के बुजुर्ग आज भी पहनते हैं सिर्फ खादी, स्वच्छता और हरियाली के लिए पूरे प्रदेश में है पहचान
रतलाम के रूपाखेड़ा गांव में महात्मा गांधी और विनोबा भावे के विचार आज भी जीवित हैं। यह गांव स्वदेशी, खादी, स्वच्छता और नशा मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है।
महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर उनके आदर्शों को देश-विदेश में याद किया जाता है, लेकिन हमारे ग्रामीण भारत में बापू के विचार आज भी पूरी तरह जीवंत हैं। रतलाम जिले का रूपाखेड़ा गांव इसका एक बेहतरीन उदाहरण है, जहां आज भी महात्मा गांधी और आचार्य विनोबा भावे के विचारों का निष्ठा से पालन किया जाता है। गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित होकर इस गांव ने आजादी के समय से ही खादी को अपनाया था, और आज भी यहां के कई बुजुर्ग केवल खादी के वस्त्र ही पहनते हैं।
🧶 सर्वधर्म प्रार्थना और चरखे की परंपरा: बुजुर्ग समरथ लाल और मोहनलाल ने आजीवन अपनाई गांधीवादी विचारधारा
आजादी के पूर्व से लेकर आज तक इस गांव में प्रतिदिन शाम को सर्वधर्म प्रार्थना करने की परंपरा चली आ रही है। रिटायर्ड प्रोफेसर प्रकाश चंद्र पाटीदार ने बताया कि हमारे पूर्वज गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन से जुड़े थे। गांव में सर्वोदय संस्था के माध्यम से स्कूल संचालित होता था, जहां चरखा चलाने और स्थानीय बुनकरों द्वारा तैयार खादी का उपयोग सिखाया जाता था। गांव के बुजुर्ग समरथ लाल पाटीदार और मोहनलाल पाटीदार ने पूरी उम्र केवल खादी के वस्त्र ही धारण किए हैं और आज भी गांव की चौपाल पर बापू के भजन गाए जाते हैं।
🚫 नशे और अपराध मुक्त गांव: स्वच्छता और हरियाली के लिए पूरे प्रदेश में ख्याति प्राप्त कर रहा है रूपाखेड़ा
रूपाखेड़ा गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह से नशे से मुक्त है। पुलिस थाने में इस गांव का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, और छोटे-मोटे विवाद गांव के बुजुर्ग चौपाल पर बैठकर ही सुलझा लेते हैं। इसके अलावा, गांव के लोग स्वच्छता को लेकर शुरू से जागरूक हैं। हर घर के बाहर नीम का पेड़ लगाना और खेतों में छायादार व फलदार वृक्ष लगाना यहां की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है, जिससे यह गांव आधुनिकता के इस दौर में भी एक आदर्श गांव के रूप में अपनी अलग पहचान बना रहा है।
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