एल नीनो आधारित खेती पर फोकस, गेहूं को रस्ट बीमारी से बचाने वाली वैरायटी से होगी 3000 करोड़ की बचत
एल नीनो और घटते भूजल स्तर के कारण भारतीय कृषि पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। कृषि अनुसंधान संस्थान ने किसानों को कम पानी वाली फसलें उगाने की सलाह दी है।
प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के गर्म होने की प्राकृतिक घटना यानी 'एल नीनो' के कारण इस बार मध्य भारत और दक्षिण भारत में मानसून की स्थिति काफी कमजोर रही है। इसका सीधा और गंभीर असर देश के फसल चक्र पर पड़ता दिखाई दे रहा है। चालू खरीफ सीजन के दौरान सोयाबीन, धान, मक्का और दलहन जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार प्रभावित हुई है। इसके साथ ही मिट्टी में नमी की कमी के कारण अभी से सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं, जिससे देश भर के अन्नदाताओं की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
🌾 गेहूं की बुवाई से पहले तेजी से घट रहा भूजल स्तर: वैज्ञानिकों ने किसानों को दी कम पानी में खेती करने की खास सलाह
आगामी रबी सीजन की मुख्य फसल यानी गेहूं की बुवाई से ठीक पहले भूजल स्तर में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। औसत वर्षा में कमी को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के 75वें स्थापना दिवस पर वैज्ञानिकों ने मध्य भारत के किसानों के लिए एल नीनो आधारित खेती की रूपरेखा जारी की है। इसके तहत किसानों को कम पानी की आवश्यकता वाली गेहूं की उन्नत वैरायटी के बीज वितरित करने और 'ड्रिप इरिगेशन' के जरिए बूंद-बूंद पानी बचाने की विशेष सलाह दी जा रही है।
💰 रस्ट बीमारी से बचाने वाली वैरायटी बचाएगी 3000 करोड़ रुपये: इस साल 120 मिलियन टन से अधिक गेहूं उत्पादन का लक्ष्य
इंदौर स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. श्रीनिवास राव ने जानकारी दी कि पिछले एक-दो सालों से एल नीनो का सबसे घातक असर देखने को मिला है। इसी को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब के किसानों के लिए ऐसे बीज दिए जा रहे हैं जो मात्र 3 से 4 पानी में तैयार हो सकें। इसके अलावा संस्थान ने गेहूं को 'रस्ट' (गेरुआ) बीमारी से बचाने वाली खास वैरायटी भी विकसित की है, जिससे किसानों के लगभग 3000 करोड़ रुपये की बचत होगी। सरकार का लक्ष्य है कि इस साल तमाम चुनौतियों के बावजूद गेहूं का कुल उत्पादन 120 मिलियन टन से ज्यादा दर्ज किया जाए।
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