साल 1933 में हरिजन आंदोलन के सिलसिले में आए थे महात्मा गांधी, रॉबर्टसन स्कूल में की थी जनसभा

महात्मा गांधी का मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर से खास नाता रहा है। बापू ने अपनी निधन के बाद ताप्ती नदी में अस्थियां विसर्जित करने की अंतिम इच्छा जताई थी।

Oct 03, 2026 - 19:06
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साल 1933 में हरिजन आंदोलन के सिलसिले में आए थे महात्मा गांधी, रॉबर्टसन स्कूल में की थी जनसभा

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर बुरहानपुर से एक बेहद गहरा और भावनात्मक रिश्ता रहा है, जहां उनकी अस्थियां भी विसर्जित की गई थीं। देश की आजादी की लड़ाई और हरिजन आंदोलन में इस शहर का भी अहम योगदान रहा है। सन 1933 में महात्मा गांधी हरिजन समाज के उत्थान के लिए बनाए गए 'हरिजन सेवक संघ फंड' में चंदा एकत्र करने के सिलसिले में बुरहानपुर आए थे। 8 दिसंबर 1933 की शाम को वे रॉबर्टसन स्कूल (वर्तमान में शासकीय सुभाष उत्कृष्ट विद्यालय) पहुंचे थे, जहां उन्होंने ताप्ती नदी के मनमोहक सौंदर्य को निहारा और स्थानीय बस्तियों का दौरा किया था।

📜 रॉबर्टसन स्कूल परिसर में की थी विशाल जनसभा: 30 जनवरी 1948 को शहादत के बाद देश भर के 110 शहरों में पहुंची थीं अस्थियां

अपने दौरे के अगले दिन यानी 9 दिसंबर 1933 को बापू ने रॉबर्टसन स्कूल परिसर में एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया था। इसी दौरान उन्होंने अपनी यह अंतिम इच्छा जाहिर की थी कि उनके निधन के पश्चात उनकी अस्थियां बुरहानपुर की ताप्ती नदी के सतियारा घाट पर ही विसर्जित की जाएं। इतिहासकार कमरूद्दीन फलक के अनुसार, 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद देश के करीब 110 शहरों में उनकी अस्थियां विसर्जित की गई थीं, जिनमें बुरहानपुर का नाम भी विशेष रूप से शामिल है क्योंकि यह बापू की अपनी स्वेच्छा से जुड़ी इच्छा थी।

🌊 गांधी हॉल में 3 दिनों तक रखे गए थे अंतिम दर्शन के लिए अवशेष: 14 फरवरी 1948 को मां ताप्ती में हुआ था विसर्जन

इतिहास के पन्नों के अनुसार, 10 फरवरी 1948 को महात्मा गांधी की अस्थियां विशेष रूप से बुरहानपुर पहुंची थीं, जिन्हें स्थानीय गांधी हॉल में लगभग तीन दिनों तक आम जनता के अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था। इस दौरान हजारों की संख्या में लोगों ने पहुंचकर राष्ट्रपिता को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी। अंततः 14 फरवरी 1948 को भारी जनसैलाब के बीच उनकी अस्थियों को ताप्ती नदी के पवित्र जल में विसर्जित किया गया, जिसकी यादें आज भी इस शहर की धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

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