उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र अधिसूचना के खिलाफ याचिका; स्थानीय निकायों की अनदेखी का आरोप
इंदौर-उज्जैन मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका। सरकार की अधिसूचना को संविधान संशोधन के विरुद्ध बताया। अब पूरे एक्ट को चुनौती देने की तैयारी।
इंदौर। राज्य सरकार द्वारा उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र को लेकर जारी की गई अधिसूचना के विरुद्ध दायर जनहित याचिका पर शुक्रवार को इंदौर हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता ने कोर्ट के समक्ष याचिका में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को जोड़ने की अनुमति मांगी थी। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने याचिकाकर्ता के आवेदन को स्वीकार करते हुए उन्हें तीन दिनों के भीतर आवश्यक बदलाव करने के निर्देश दिए हैं। अब अगले सप्ताह होने वाली सुनवाई में याचिकाकर्ता इस परियोजना के साथ-साथ पूरे 'मेट्रोपॉलिटन एक्ट' को ही कानूनी चुनौती देंगे।
🚫 स्थानीय निकायों की अनदेखी का आरोप
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अक्षत पहाड़िया ने तर्क दिया कि सरकार की मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र संबंधी अधिसूचना संविधान के 74वें संशोधन की भावना के विपरीत है। याचिका में यह प्रमुखता से उठाया गया है कि मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र का निर्णय लेते समय स्थानीय निकायों को पूरी तरह अनदेखा किया गया। न तो इन निकायों से चर्चा की गई और न ही उनके सुझाव लिए गए। आरोप है कि कानूनन गठित होने वाली कमेटी में दो-तिहाई जनप्रतिनिधि होने चाहिए थे, लेकिन मौजूदा अधिसूचना में सारी शक्तियां एक अथॉरिटी को सौंप दी गई हैं, जिससे कमेटी शक्तिहीन हो गई है।
📊 75 लाख की आबादी और 16 हजार वर्ग किमी का दायरा
मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के दायरे में इंदौर, देवास, उज्जैन, धार, शाजापुर और रतलाम जिलों की 38 तहसीलों के 2781 गांव शामिल किए गए हैं। कुल 16,000.87 वर्ग किमी के इस क्षेत्र में लगभग 75.34 लाख की आबादी रहने का अनुमान है। याचिका में इस बात पर भी आपत्ति जताई गई है कि जहां इंदौर का 100% क्षेत्र शामिल किया गया है, वहीं उज्जैन का केवल 59% हिस्सा ही लिया गया है। इसके बावजूद मुख्यालय उज्जैन में बनाए जाने के निर्णय को लेकर असंतुलन पर सवाल उठाए गए हैं।
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