सोने की कीमतों में आ सकती है 20 हजार रुपए तक की गिरावट; क्या खरीदारी का है सही समय?
सोने की कीमतों में भारी गिरावट के संकेत! अंतरराष्ट्रीय बाजार में मंदी के दौर के बीच सोना $3,500 तक फिसल सकता है। जानें निवेशकों के लिए आगे की रणनीति।
वर्ष 2026 की शुरुआत में रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद अब सोने की कीमतों पर भारी दबाव बना हुआ है। जनवरी 2026 में 5,595 डॉलर प्रति औंस के ऑल-टाइम हाई स्तर के बाद ग्लोबल मार्केट में सोना करीब 27 फीसदी टूटकर 'बेयर मार्केट' में प्रवेश कर चुका है। बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि कीमतों में अभी 16 फीसदी तक की और गिरावट हो सकती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय भाव 3,400 से 3,500 डॉलर प्रति औंस तक आ सकते हैं। भारतीय बाजार के संदर्भ में देखें, तो सोने की कीमतों में 20,000 रुपये तक की गिरावट संभव है।
📊 क्यों गिर रही हैं सोने की कीमतें?
सोने में इस गिरावट के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं:
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जियोपॉलिटिकल तनाव: मिडिल ईस्ट में संघर्ष के कारण निवेशकों पर दोहरी मार पड़ी है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें महंगाई और फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की चिंता बढ़ा रही हैं।
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मजबूत अमेरिकी डॉलर: डॉलर के मजबूत होने से अन्य मुद्रा वाले खरीदारों के लिए सोने का आकर्षण कम हो गया है।
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तकनीकी सुधार (Technical Correction): एक्सपर्ट्स का मानना है कि पिछले दो वर्षों में सोने की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई थीं, इसलिए एक तकनीकी करेक्शन स्वाभाविक था।
💡 आगे क्या करें निवेशक?
समको सिक्योरिटीज और जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज के विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही निकट भविष्य में कमजोरी दिख रही हो, लेकिन दीर्घकालिक नजरिया (Long-term view) अभी भी पॉजिटिव है। 4,000 डॉलर का स्तर एक महत्वपूर्ण सपोर्ट लेवल माना जा रहा है। विशेषज्ञों की राय है कि कीमत में हर गिरावट को 'खरीदारी के अवसर' के तौर पर देखा जाना चाहिए। तीन साल के नजरिए से देखें तो सोने के लिए 7,000 डॉलर का टारगेट भी तय किया जा रहा है।
🏦 सेंट्रल बैंकों की खरीदारी बनी 'प्राइस फ्लोर'
बाजार के लिए एक सकारात्मक संकेत सेंट्रल बैंकों द्वारा सोने का लगातार संचय है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) के आंकड़े बताते हैं कि सेंट्रल बैंक पिछले चार वर्षों में औसतन 1,000 टन सोना जमा कर रहे हैं, जो रिजर्व पोर्टफोलियो में सोने की बढ़ती रणनीतिक भूमिका को दर्शाता है। भले ही HSBC ने अपने लंबे समय के अनुमान को थोड़ा घटाया हो, लेकिन सेंट्रल बैंकों की यह निरंतर खरीदारी बाजार में कीमतों का निचला स्तर (Price Floor) तय करने में मदद करेगी।
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