भोपाल में हरियाली के दावों की पोल, कलियासोत और पटेल नगर में सैकड़ों हरे-भरे पेड़ कटे
भोपाल के कलियासोत और पटेल नगर में बिना अनुमति सैकड़ों पेड़ काटे गए। प्रशासन द्वारा केवल जुर्माना लगाने और पारदर्शिता की कमी से पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश है।
भोपाल: मध्य प्रदेश की राजधानी में हरियाली बचाने और पर्यावरण संरक्षण के तमाम बड़े दावों के बीच, पेड़ों की अवैध कटाई के दो बड़े मामलों ने नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर के कलियासोत क्षेत्र में पौधरोपण के नाम पर 66 हरे-भरे पेड़ों को काट दिया गया, जबकि पटेल नगर स्थित सेंट मान्टफोर्ट स्कूल के ठीक सामने वर्षों पुराने सैकड़ों पेड़ों को जड़ से खत्म कर दिया गया है। अब इन दोनों संवेदनशील मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई और परियोजना की पारदर्शिता को लेकर शहर भर में आक्रोश है।
🌳 कलियासोत में पौधरोपण के नाम पर 66 वृक्षों की बलि
कलियासोत-भदभदा क्षेत्र में नगर निगम ने 10 हजार पौधे लगाने का एक बड़ा ठेका दिया था। आरोप है कि संबंधित ठेकेदार को केवल अनावश्यक झाड़ियां हटाने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन ठेकेदार ने नियमों को ताक पर रखकर नीम, गूलर और शीशम जैसे 66 हरे-भरे और छायादार पेड़ों पर आरी चला दी। जब स्थानीय जागरूक नागरिकों ने इसका विरोध किया और मामला मीडिया की सुर्खियों में आया, तब जाकर नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारी हरकत में आए।
⚖️ ठेकेदार पर सिर्फ जुर्माना, आपराधिक कार्रवाई से परहेज क्यों?
प्रारंभिक जांच में ठेकेदार की घोर लापरवाही सामने आने के बाद नगर निगम ने उस पर 3.30 लाख रुपये का जुर्माना ठोक दिया है। इसके साथ ही उसे काटे गए पेड़ों की संख्या से दस गुना ज्यादा, यानी 660 औषधीय पौधे लगाने और अगले तीन वर्षों तक उनके संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
गौरतलब है कि कुछ दिन पूर्व हुई टीएल (TL) बैठक में स्वयं निगमायुक्त ने बिना अनुमति पेड़ काटने वालों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। इसके बावजूद, इस मामले में केवल आर्थिक दंड तक ही कार्रवाई को सीमित रखने पर अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर शक्तिशाली लोगों को बचाया क्यों जा रहा है?
🏫 सेंट मान्टफोर्ट स्कूल के सामने पेड़ों पर चली आरी
दूसरा गंभीर मामला पटेल नगर स्थित सेंट मान्टफोर्ट स्कूल के ठीक सामने का है, जहां सड़क के किनारे लगे वर्षों पुराने विशाल पेड़ों को रातों-रात काट दिया गया। स्थानीय निवासियों का कहना है कि पेड़ों की कटाई के दौरान न तो वहाँ कोई सूचना बोर्ड लगाया गया और न ही यह बताया गया कि यह कार्रवाई किस सरकारी परियोजना के तहत की जा रही है। बिना किसी जानकारी के पुराने पेड़ों को मिटा देना प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता प्रमाण है।
🧐 हरियाली बचाने के सरकारी दावों की खुलती पोल
पर्यावरण कार्यकर्ता राशिद नूर ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, "एक ही सप्ताह के भीतर सामने आए इन दोनों मामलों ने शहर में हरियाली संरक्षण के सरकारी दावों की पोल खोल कर रख दी है।"
पर्यावरण प्रेमियों का साफ कहना है कि यदि बिना अनुमति पेड़ काटने वालों पर केवल मामूली जुर्माना लगाकर मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा, और अन्य मामलों में जिम्मेदार एजेंसियों का पता तक सार्वजनिक नहीं होगा, तो आने वाले समय में हरियाली बचाने के सरकारी अभियान केवल कागजी फाइलों तक ही सीमित रह जाएंगे। शहर को बचाने के लिए अब प्रशासन को सख्त और पारदर्शी कदम उठाने की आवश्यकता है।
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