ई-टोकन व्यवस्था बंद होने के बाद बढ़ी किसानों की मुश्किलें, खाद की कालाबाजारी जोरों पर
जबलपुर में खाद वितरण प्रणाली में गड़बड़ी के चलते किसानों को सुबह 4 बजे से लाइन लगानी पड़ रही है। किराए की जमीन पर खेती करने वालों को खाद नहीं मिलने से फसल संकट में है।
बीते दिनों भोपाल में किसानों द्वारा मूंग खरीदी और खाद बिक्री को लेकर बड़ा आंदोलन किया गया था, जिसके बाद ई-टोकन व्यवस्था के जरिए खाद की बिक्री का विरोध भी देखने को मिला था। लेकिन अब इस बदलाव के बाद जबलपुर के किसानों के सामने एक नई और गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। हालात यह हैं कि एक बार फिर सुबह 4:00 बजे से सरकारी खाद विक्रय केंद्रों के बाहर किसानों की लंबी-लंबी कतारें लगने लगी हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जो किसान किराए की जमीन पर खेती कर रहे हैं, उन्हें नियमों के पेंच के कारण खाद मिल ही नहीं पा रही है, जिससे उनकी फसल बर्बादी के कगार पर पहुँच गई है।
🏢 मुंबई में बैठा है जमीन का मालिक, किराएदार किसान अरविंद पटेल परेशान
जबलपुर के भेड़ाघाट स्थित हिनौता गांव के रहने वाले किसान अरविंद पटेल ने किराए पर जमीन लेकर खेती करने का निर्णय लिया। दिलचस्प बात यह है कि उस जमीन का मालिक मुंबई की एक निजी कंपनी में नौकरी करता है। अरविंद ने लगभग 35 एकड़ जमीन 55,000 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से किराए पर ली है, जिसमें उनका भारी-भरकम पैसा निवेश हो चुका है। खेतों में धान की फसल लहलहा रही है, जिसे इस वक्त खाद की सख्त जरूरत है। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए अरविंद जबलपुर के विजयनगर कृषि उपज मंडी स्थित सरकारी खाद विक्रय केंद्र पहुँचे, लेकिन वहां उन्हें यह कहकर खाद देने से मना कर दिया गया कि नियम के मुताबिक खाद केवल जमीन के असली मालिक को ही मिल सकती है।
🔍 फिंगरप्रिंट का पेंच और किराएदार किसानों के सामने खड़ी फसल की बर्बादी
मौजूदा खाद वितरण प्रणाली में किसान का फिंगरप्रिंट (अंगूठे का निशान) लिया जा रहा है, लेकिन किराए की जमीन पर खेती करने वाले किसान का फिंगरप्रिंट सरकारी पोर्टल पर मान्य नहीं होता क्योंकि जमीन मालिक मुंबई में है। किसान अरविंद पटेल का दर्द है कि जिन लोगों ने किराए पर जमीन लेकर खेती की है, उनके लिए खाद देने का कोई सिस्टम ही नहीं बनाया गया है। यही कारण है कि अकेले अरविंद ही नहीं, बल्कि ऐसे सैकड़ों किसानों की फसलें खाद न मिलने के कारण बर्बाद होने की कगार पर पहुँच चुकी हैं।
⏰ आंदोलन के बाद बंद हुई ई-टोकन व्यवस्था, रात 4 बजे से लग रही कतारें
इसी तरह अपनी फसल के लिए खाद लेने पहुँचे प्रमोद कुमार (जो पनागर से आए हैं और जिनके खेत मंडी से करीब 30 किलोमीटर दूर हैं) ने बताया कि पहले खाद ई-टोकन के जरिए आसानी से मिल जाया करती थी। लेकिन किसान आंदोलन के बाद वह व्यवस्था बंद कर दी गई और अब सीधे विक्रय केंद्र से खाद लेने की मजबूरी है। पर्याप्त खाद न मिलने के डर से किसान रात के 4:00 बजे ही मंडी के गेट पर पहुँचकर अपनी आमद दर्ज कराने लगे हैं। सुबह 4 से 5 बजे के बीच ही लगभग 50 किसान कतारों में खड़े हो जाते हैं, क्योंकि दिनभर में केवल सीमित (लगभग 100) किसानों को ही खाद वितरित हो पाती है।
⚠️ कालाबाजारी फिर हुई सक्रिय, डीएपी की कमी से जूझ रहे अन्नदाता
एक तरफ जहाँ किसानों को सरकारी दुकानों पर धक्के खाने पड़ रहे हैं, वहीं ई-टोकन व्यवस्था बंद होने का फायदा उठाकर खाद की कालाबाजारी करने वाले लोग एक बार फिर सक्रिय हो गए हैं। जानकारों का कहना है कि इन्हीं तत्वों ने पुरानी व्यवस्था को फेल कराने में भूमिका निभाई थी ताकि वे जरूरतमंद किसानों को महंगे दामों पर खाद बेच सकें। हालांकि, प्रशासन ने कालाबाजारी करती हुई दो गाड़ियों को पकड़ा भी है। वर्तमान में यूरिया और डीएपी की बिक्री केवल सरकारी केंद्रों पर है और रैक के जरिए कछपुरा रेलवे स्टेशन पर खाद पहुँचती है, लेकिन विजयनगर की सरकारी दुकान पर डीएपी खत्म होने के कारण स्थिति और गंभीर हो गई है। जबलपुर में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती होती है, और समय पर पर्याप्त खाद न मिलने से छोटे किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं।
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