छिंदवाड़ा में पलाश के पत्तों से दोना-पत्तल बना रहे ग्रामीण, सावन-भादों में बढ़ जाती है पारंपरिक मांग
छिंदवाड़ा में सावन और भादों के पवित्र महीने में पलाश के पत्तों से दोना और पत्तल बनाने की परंपरा जारी है। यह गरीब परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन है।
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में सावन और भादों के इस पावन महीने में आस्था, संस्कृति और प्रकृति का एक बेहद सुंदर और अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। देशभर के प्रसिद्ध शिवालयों और मंदिरों में जहाँ आस्था का सैलाब उमड़ा हुआ है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में सड़क के किनारे फूल-माला और पलाश के पत्तों से पारंपरिक दोना और थाल (पत्तल) बनाते हुए लोग आसानी से नजर आ जाते हैं। यह कार्य न केवल सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति और परंपरा को जीवित रखने का एक सशक्त जरिया है, बल्कि कई गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए आजीविका का एक महत्वपूर्ण साधन भी बना हुआ है।
📜 धार्मिक और पौराणिक महत्व: पलाश के पत्तों में वास करते हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश
हिंदू शास्त्रों और मान्यताओं के अनुसार, पलाश के पत्तों को 'स्वर्ण पत्र' के समान अत्यंत पवित्र माना जाता है। लक्ष्मी नारायण मंदिर के प्रसिद्ध पंडित सुनील दुबे बताते हैं कि पलाश के इन पत्तों में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। इसी पवित्रता के कारण सावन, भादों और भुजलिया (कजलिया) पर्व के दौरान इनका उपयोग विशेष रूप से किया जाता है। भुजलिया का यह पर्व रक्षाबंधन या उसके आसपास हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, जहाँ मिट्टी या दोनों में अनाज बोकर विसर्जन किया जाता है और एक-दूसरे को गले मिलकर भुजरिया की बधाइयाँ दी जाती हैं। धार्मिक दृष्टि से पलाश के पत्ते पर पूजन सामग्री अर्पित करना अत्यंत शुभ फलदायी माना गया है।
🍂 जंगलों में घट रही उपलब्धता और पारंपरिक व्यवसाय की चुनौतियाँ
पलाश के पत्तों से दोना-पत्तल बनाने का कार्य करने वाली शिव कुमारी बंदेवार ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि वह विवाह के पश्चात से ही इस पारंपरिक व्यवसाय से जुड़ी हुई हैं। सावन और भादों के महीनों में इन पारंपरिक दोनों और पत्तलों की विशेष माँग रहती है, जिससे उनके परिवार का भरण-पोषण चलता है। हालांकि, आधुनिकता के दौर में अब जंगलों और ग्रामीण अंचलों में पलाश के पत्ते आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, जिसके कारण इन्हें एकत्रित करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। इसके बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अपनी इस प्राचीन कला और आजीविका के साधन को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
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