ताड़पत्र और प्राकृतिक रंगों से बनी अद्भुत कलाकृतियां, आधुनिकता के साथ बदल रही पटचित्र शैली
उड़ीसा के कलाकार देवी प्रसाद ने ताड़ के पत्तों पर 9 महीने की मेहनत से अद्भुत पटचित्र तैयार किया है। जानिए इस प्राचीन भारतीय कला की खासियत।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में इन दिनों उड़ीसा की प्राचीन और समृद्ध लोक कला का एक बेहद अनूठा रूप देखने को मिल रहा है। उड़ीसा के प्रसिद्ध रघुराजपुर गांव से ताल्लुक रखने वाले पटचित्र कलाकार देवी प्रसाद अपनी बेहतरीन कलाकृतियों के साथ भोपाल में हैं। उनके द्वारा ताड़ के पत्तों को धागे से बांधकर तैयार किया गया सात फीट लंबा और दो फीट चौड़ा कैनवास कला प्रेमियों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इस ताड़चित्र को पूरा करने में उन्हें पूरे नौ महीने का समय लगा है, जिसमें 1200 कैरेक्टर्स और 2600 फिगर्स को आधे-आधे इंच की बारीकी के साथ उकेरा गया है। भारत के जीवन दर्शन और पौराणिक कथाओं को दर्शाती इस कलाकृति की कीमत 2 लाख 48 हजार रुपये है, जिसे कलाकार अपनी संतान की तरह सहेज कर रखते हैं।
🎨 बदलते दौर में पारंपरिक कला का आधुनिकीकरण: जगन्नाथ कथा से लेकर हनुमान चालीसा और लाइफ ऑफ ट्री तक का सफर
समय के साथ कला और लोगों की पसंद में आए बदलाव को अपनाते हुए इन कलाकारों ने पटचित्र में कई नए प्रयोग किए हैं। देवी प्रसाद बताते हैं कि पारंपरिक रूप से पटचित्र में भगवान जगन्नाथ की कथाएं मुख्य रूप से बनाई जाती थीं, जो हमेशा रहेंगी, लेकिन अब इस कला को जीवित रखने और व्यापक दायरा देने के लिए उन्होंने कृष्ण कथा, शिव कथा, रामचरितमानस, गणेश कथा के साथ-साथ 'लाइफ ऑफ ट्री' और हनुमान चालीसा जैसे प्रसंग भी ताड़पत्रों पर उकेरने शुरू कर दिए हैं। इससे यह कला किसी एक आस्था तक सीमित न रहकर अन्य लोगों के घरों तक भी पहुंच रही है। प्राकृतिक रंगों, पुरानी साड़ियों और ताड़ के पत्तों को प्रोसेस करके तैयार होने वाली इस पारंपरिक कला में धैर्य और पौराणिक पात्रों की गहरी समझ की जरूरत होती है, हालांकि युवाओं में सब्र की कमी और कलाकारों के घटने से यह समृद्ध विरासत चुनौतियों का भी सामना कर रही है।
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