मध्य प्रदेश न्यूज़: देश की सबसे ऊंची और प्राचीन कुबेर प्रतिमा; RBI के प्रतीक चिह्न से भी जुड़ा है नाता
विदिशा संग्रहालय में 2200 साल पुरानी भगवान कुबेर की 12 फीट ऊंची देश की सबसे प्राचीन प्रतिमा संरक्षित है। जानिए इसका इतिहास और धनतेरस पूजन का महत्व।
विदिशा: मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर विदिशा स्थित जिला पुरातत्व संग्रहालय में धन के देवता भगवान कुबेर की 12 फीट ऊंची विशालकाय प्रतिमा स्थापित है। पुरातात्विक अध्ययनों के अनुसार यह प्रतिमा लगभग 2200 वर्ष पुरानी (द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व) मानी जाती है। धनतेरस के पावन अवसर पर इस अति-दुर्लभ प्रतिमा के दर्शन और आशीर्वाद के लिए संग्रहालय में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। देश भर में भगवान कुबेर की ऐसी विशालकाय प्रतिमाएं केवल चार स्थानों पर ही स्थित हैं—विदिशा, मथुरा (उत्तर प्रदेश), पटना (बिहार) और भरतपुर (राजस्थान)। इनमें से विदिशा की यह प्रतिमा सबसे ऊंची, प्राचीन और शिल्पकला की दृष्टि से अति-महत्वपूर्ण मानी जाती है।
📜 विदिशा संग्रहालय में संरक्षित हैं कुबेर की 5 दुर्लभ प्रतिमाएं; RBI के प्रतीक चिह्न से भी जुड़ा है नाता
संग्रहालय की व्यवस्था और ऐतिहासिक संदर्भ:
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कुबेर की 5 प्रतिमाएं: संग्रहालय की प्रभारी अधिकारी नम्रता यादव और वरिष्ठ मार्गदर्शक रामनिवास शुक्ला ने बताया कि विदिशा जिला पुरातत्व संग्रहालय में भगवान कुबेर की कुल 5 दुर्लभ प्रतिमाएं संरक्षित हैं। मुख्य द्वार पर स्थित विशाल प्रतिमा वर्ष 1962 में बेतवा एवं बेस नदी के संगम (त्रिवेणी घाट) से प्राप्त हुई थी और 1964-65 में इसे संग्रहालय के मुख्य द्वार पर स्थापित किया गया था।
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यक्षिणी की प्रतिमा व RBI कनेक्शन: संग्रहालय में कुबेर की पत्नी यक्षिणी की लगभग 7 फीट ऊंची प्रतिमा भी संरक्षित है, जिसके एक हाथ में धन की थैली और दूसरे हाथ में लेखा-जोखा की बही-खाता (डायरी) है। इसके अलावा 7वीं-8वीं और 11वीं-12वीं शताब्दी की तीन अन्य कुबेर प्रतिमाएं भी यहाँ सुरक्षित हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के प्रतीक चिह्न से भी इस यक्ष-यक्षिणी प्रतिमा की कला शैली का संबंध माना जाता है।
🌊 नदी में उलटी पड़ी थी प्रतिमा, वर्षों तक लोग पीठ पर धोते रहे कपड़े; जलस्तर कम होने पर हुई पहचान
प्रतिमा मिलने की दिलचस्प कहानी:
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प्राचीन बैसनगर का गौरव: प्राचीन काल में विदिशा का बैसनगर क्षेत्र व्यापार और आर्थिक समृद्धि का प्रमुख अंतरराष्ट्रीय केंद्र हुआ करता था। बेतवा और बेस नदी के संगम के पास यक्ष-यक्षिणी का विशाल मंदिर रहा होगा, जो कालक्रम में नष्ट हो गया।
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कपड़े धोने की शिला बनी प्रतिमा: मंदिर ध्वस्त होने के बाद यह भारी-भरकम प्रतिमा नदी के तल में उलटी पड़ी रही। इसका पिछला सपाट हिस्सा ऊपर होने के कारण लंबे समय तक स्थानीय लोग इसे साधारण शिला समझकर इसकी पीठ पर कपड़े धोते रहे। वर्ष 1960 के आसपास जब नदी का जलस्तर काफी कम हुआ, तब पत्थर के पिछले हिस्से पर उकेरी गई आकृतियाँ दिखाई दीं और पुरातत्व विभाग के सहयोग से इसे बाहर निकाला गया।
🪔 धनतेरस पर 18-19 वर्षों से पूजा कर रहे हैं श्रद्धालु; सफेद बलुआ पत्थर से बनी है कलाकृति
श्रद्धालुओं का अनुभव और प्रतिमा की बनावट:
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वार्षिक पूजन परंपरा: धनतेरस पर दर्शन के लिए पहुँचे श्रद्धालु सुशील शर्मा ने बताया कि वे और उनके साथी पिछले 18-19 वर्षों से निरंतर धनतेरस के दिन यहाँ आकर भगवान कुबेर की पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि कुबेर देव सुख, समृद्धि, यश और वैभव प्रदान करते हैं।
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प्रतिमा की बनावट: जिला पुरातत्व संग्रहालय के मुख्य प्रवेश द्वार पर स्थापित यह मास्टरपीस प्रतिमा सफेद बलुआ पत्थर (White Sandstone) से निर्मित है। प्रतिमा में कुबेर के हाथ में धन की गठरी, गले में कंठा और शरीर पर पारंपरिक आभूषण दिखाई देते हैं। सामने से दिखने वाला हिस्सा 12 फीट ऊंचा है, जबकि इसकी कुल वास्तविक ऊंचाई लगभग 17 फीट बताई जाती है।
📖 विष्णु गैलरी में विराजमान हैं कुबेर की पत्नी यक्षिणी; प्राचीन शिल्पकला का अद्वितीय उदाहरण
यक्षिणी प्रतिमा की विशेषताएं:
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2200 साल पुरानी यक्षिणी: इतिहासकार गोविंद देवलिया और संग्रहालय अधिकारियों के अनुसार, संग्रहालय की विष्णु गैलरी में कुबेर की पत्नी यक्षिणी की भी करीब 2200 वर्ष पुरानी और 7 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है।
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शिल्पकला का बेजोड़ नमूना: प्रतिमा में यक्षिणी के एक हाथ में धन की थैली और दूसरे हाथ में हिसाब-किताब की पुस्तक उकेरी गई है। खुले बाल, गले के प्राचीन आभूषण, हाथों में बाजूबंद और पैरों में भारी कड़े उस कालखंड की उन्नत शिल्पकला को प्रदर्शित करते हैं। इतिहासकारों के मुताबिक, विशाल यक्ष और यक्षिणी की प्रतिमाओं का एक साथ एक ही स्थान पर मिलना विदिशा के समृद्ध इतिहास की अनूठी देन है।
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