अतिवृष्टि और सूखे की चिंता खत्म! इस आधुनिक तकनीक से किसान बढ़ा रहे अपनी आय, जानें क्या है तरीका

उज्जैन के किसान अश्विनी सिंह चौहान ने 'रेज्ड बेड' तकनीक से सोयाबीन की खेती को बनाया मुनाफे का सौदा। कम बीज, कम लागत और जलभराव से मुक्ति का वैज्ञानिक तरीका।

Jul 08, 2026 - 10:29
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अतिवृष्टि और सूखे की चिंता खत्म! इस आधुनिक तकनीक से किसान बढ़ा रहे अपनी आय, जानें क्या है तरीका

उज्जैन। मालवा क्षेत्र में सोयाबीन को "सोना" कहा जाता है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में मौसम की अनिश्चितता और जलभराव ने किसानों की कमर तोड़ दी थी। इस चुनौती का सामना करते हुए उज्जैन की घट्टिया तहसील के पिपलियाहामा गांव के किसान अश्विनी सिंह चौहान ने एक सफल वैज्ञानिक समाधान निकाला है। उन्होंने "रेज्ड बेड" (मेड़ एवं नाली) तकनीक अपनाकर न केवल फसल को सड़ने से बचाया, बल्कि उत्पादन में भी रिकॉर्ड वृद्धि की है। उनकी इस तकनीक को कृषि जगत में इतनी सराहना मिली कि साल 2022 में उन्हें ICAR-IARI किसान फेलोशिप पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

⚙️ क्या है रेज्ड बेड तकनीक और यह क्यों है फायदेमंद?

अश्विनी सिंह के अनुसार, इस तकनीक में खेत को समतल बोने के बजाय मेड़ें (ऊंचाई) बनाई जाती हैं और उनके बीच नालियां रखी जाती हैं। फसल मेड़ पर बोई जाती है, जिससे अतिरिक्त पानी नालियों के जरिए बाहर निकल जाता है।

  • अतिवृष्टि से बचाव: पानी नालियों में बह जाने से बीज सड़ता नहीं है और अंकुरण सुरक्षित रहता है।

  • अल्पवृष्टि में लाभ: मेड़ों में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, जिससे सूखे की स्थिति में भी फसल 15-20 दिन तक सुरक्षित रह सकती है।

  • लागत में कमी: जहां सामान्य किसान 100-150 किलो बीज डालते हैं, वहां इस तकनीक से मात्र 55 किलो बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है।

🚀 अन्य फसलों में भी है कारगर

यह तकनीक न केवल सोयाबीन, बल्कि मक्का, उड़द, मूंग, ज्वार, मूंगफली, राजमा, चना, आलू, लहसुन और प्याज जैसी कई फसलों में सफल साबित हो रही है। रेज्ड बेड पर मिट्टी भुरभुरी रहने से जड़ों का विकास तेजी से होता है, जिससे पौधे को नाइट्रोजन अधिक मिलती है और फलियां बड़ी व दाने मोटे होते हैं।

📢 किसान के लिए प्रेरणा का संदेश

अश्विनी सिंह का मानना है कि सरकार पर निर्भर रहने के बजाय किसानों को समय के साथ नई तकनीक अपनानी चाहिए। वे कहते हैं, "अगर किसान उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बढ़ा ले, तो उसकी आमदनी अपने आप बढ़ जाएगी।" उनका यह नवाचार आज देशभर के किसानों के लिए एक उदाहरण बन गया है, जो साबित करता है कि स्थानीय परिस्थितियों में वैज्ञानिक प्रयोग करके खेती को न केवल सुरक्षित बल्कि अत्यधिक लाभदायक भी बनाया जा सकता है।

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