पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े और अन्य कांग्रेसी नेता 2020 के आगर मालवा केस में बरी, कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
इंदौर की एमपी-एमएलए कोर्ट ने 2020 के आगर मालवा केस में पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े समेत अन्य आरोपियों को बरी कर दिया है। पुलिस आरोप साबित करने में असफल रही।
इंदौर : मध्य प्रदेश की विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट ने वर्ष 2020 के आगर मालवा केस में पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े सहित अन्य कांग्रेसी नेताओं को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया है। साल 2020 में आगर मालवा के बड़ौद थाने में इन सभी नेताओं के खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा पहुँचाने का प्रकरण दर्ज किया गया था। बुधवार को इस बहुचर्चित मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए अदालत ने पूर्व विधायक सहित अन्य सभी आठ आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है।
⚖️ एमपी-एमएलए कोर्ट ने सभी आरोपियों को किया बरी
बड़ौद थाना प्रभारी द्वारा पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े और अन्य आरोपियों के खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा पहुँचाने सहित विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया गया था, जिसकी लंबी कानूनी सुनवाई इंदौर की एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट में चल रही थी।
आरोपियों के अधिवक्ता आशीष शर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि पुलिस द्वारा कोर्ट के समक्ष तमाम दस्तावेज, साक्ष्य और सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत किए गए थे। इसके साथ ही अभियोजन पक्ष की ओर से कई गवाह भी अदालत में पेश हुए। पत्रावली पर उपलब्ध तमाम सबूतों और गवाहों के बरीबारी से परीक्षण के बाद कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए, जिसका सीधा फायदा अंततः आरोपी पक्ष को मिला।
🗣️ थाना प्रभारी से बहस और अभद्रता के मामले में आया फैसला
इस पूरे मामले में कुछ अहम सबूतों के आधार पर और संदेह का लाभ देते हुए कोर्ट ने पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े और अन्य को बरी कर दिया है। पूर्व विधायक तथा अन्य पर यह आरोप था कि उन्होंने 23 नवंबर 2020 को बड़ौद थाने के थाना प्रभारी के साथ कथित तौर पर अभद्रता की थी और उनके शासकीय कार्य में बाधा डाली थी।
जब इस मामले की सुनवाई इंदौर की अदालत में हुई, तो अभियोजन पक्ष के तमाम तर्कों को दरकिनार करते हुए अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि केवल एक जनप्रतिनिधि द्वारा पुलिस अधिकारियों से तीखी बहस या बातचीत करने मात्र से किसी पर शासकीय कार्य में बाधा डालने का आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं किया जा सकता है।
🏛️ कोर्ट की अहम टिप्पणी: "केवल बहस करना शासकीय कार्य में बाधा नहीं"
अदालत ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 353 के तहत अपराध तभी प्रमाणित माना जा सकता है, जब यह पूरी तरह से सिद्ध हो सके कि किसी लोक सेवक (सरकारी कर्मचारी) को उसके वैध कर्तव्य के निर्वहन से रोकने के लिए आरोपी द्वारा किसी प्रकार के आपराधिक बल (Criminal Force) का प्रयोग किया गया था या उस पर हमला किया गया था।
लेकिन इस पूरे मामले में अभियोजन पक्ष ऐसा कोई भी ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह सिद्ध हो सके। इसी मुख्य आधार पर कोर्ट ने पूर्व विधायक और अन्य सभी को बरी कर दिया।
यह पूरा मामला पिछले कई वर्षों से लगातार सुर्खियों में बना हुआ था और घटना के लगभग 6 साल बाद आखिरकार अदालत के इस फैसले से आरोपियों को बड़ी कानूनी राहत मिल गई है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)