पक्की सड़क न बनने से आहत सिवनी के सरपंच का दर्द, बोले- 'अब आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नहीं'
सिवनी जिले के बखारी गांव में पक्की सड़क न होने से ग्रामीणों को खाट पर मरीज ले जाना पड़ रहा है। विकास न होने से परेशान सरपंच ने आत्महत्या तक की बात कही है।
सिवनी: मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से एक बेहद दर्दनाक और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ के एक स्थानीय सरपंच का दर्द तब छलक उठा जब वे अपने गांव में बुनियादी सुविधाएं और पक्की सड़क तक नहीं बनवा पाए। सरपंच का कहना है कि जनता ने उन्हें इस उम्मीद के साथ चुना था कि उनके गांव की किस्मत बदलेगी और पक्की सड़क का निर्माण होगा, लेकिन जनप्रतिनिधियों से लेकर तमाम बड़े अधिकारियों तक गुहार लगाने के बाद भी जब किसी ने उनकी एक नहीं सुनी, तो आज स्थिति यह हो गई है कि गांव की जनता उन्हें ताने मारती है और गालियां देती है। तंग आकर सरपंच ने यहाँ तक कह दिया कि अब उनके पास आत्महत्या करने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।
🛣️ गांव में विकास न करवा पाने से दुखी सरपंच ने बयां किया अपना दर्द
सिवनी जिले के अंतर्गत आने वाले लखनादौन विधानसभा क्षेत्र की घंसौर तहसील के बखारी गांव में पक्की सड़क का नामोनिशान तक नहीं है। बरसात के इस मौसम में स्थिति इतनी अधिक भयावह हो जाती है कि पूरे गांव का संपर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाता है।
परिणामस्वरूप, ग्रामीणों को किसी भी गंभीर मरीज को अस्पताल पहुँचाने के लिए करीब 5 किलोमीटर तक का लंबा सफर दलदली और कीचड़ भरे रास्ते से खाट पर लादकर तय करना पड़ता है। सोशल मीडिया पर एक ऐसा ही वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें कुछ ग्रामीण एक बीमार व्यक्ति को चारपाई पर लिटाकर कीचड़ भरे रास्ते से निकालते दिखाई दे रहे हैं।
इस व्यवस्था से लाचार बखारी गांव के सरपंच रमेश ने रोते हुए कहा कि, ''जनता ने मुझे इसलिए चुना था कि हमारे गांव का विकास होगा, लेकिन विकास तो बहुत दूर की बात है, मैं अपने गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली एक सिंगल पक्की सड़क तक नहीं बनवा पाया हूँ। आज स्थिति यह है कि गांव के लोग मुझे कोसते हैं और ताने मारते हैं, जिसे सुनकर अब लगता है कि मेरे पास आत्महत्या करना ही एकमात्र अंतिम विकल्प बचा है।''
👵 सड़क का सपना देखते-देखते बीत गई 70 साल की उम्र
गांव की बुजुर्ग महिला पूषा बाई, जिनकी उम्र 70 वर्ष पार कर चुकी है, उन्होंने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि, ''आज से करीब 55 साल पहले शादी के बाद मैं इस गांव में आई थी, और तब से लेकर आज तक हमारे गांव में केवल कच्ची और पथरीली सड़क ही है। हमारे लिए पक्की सड़क देखना किसी बड़े सपने से कम नहीं है।''
उन्होंने आगे बताया कि यदि गांव में अचानक कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए या किसी गर्भवती महिला को समय पर अस्पताल पहुँचाना पड़े, तो बरसात के इन दिनों में केवल 'खाट' ही हमारा एकमात्र सहारा बचती है। कई बार तो ऐसा हुआ है कि हमारी अपनी आंखों के सामने इलाज समय पर न मिलने के कारण लोगों ने दम तोड़ दिया है। चुनाव के समय तमाम बड़े नेता और उम्मीदवार गांव में आते हैं, बड़े-बड़े वादे करके चले जाते हैं, लेकिन आज तक सड़क का निर्माण नहीं हुआ। हमारी पूरी जिंदगी इसी इंतजार में बीत गई और अब ऐसा लगता है कि सड़क का सपना सिर्फ सपना ही बनकर रह जाएगा।
🗳️ नेताओं के झूठे वादों से तंग आए ग्रामीण, अब चुनाव में बहिष्कार का मन
गांव के एक अन्य ग्रामीण अनिल ऊइके का कहना है कि हमारे गांव में सड़क न होने की वजह से पिछले चुनावों के दौरान हमने इसका कड़ा विरोध किया था और वोट न देने का पूरा मन बना लिया था। उस समय भी कई नेताओं ने हमारे पास आकर आश्वासन दिए थे और हमने उनके वादों पर भरोसा करके उन्हें वोट दे दिया था, लेकिन चुनाव जीतने के बाद किसी ने हमारी सुध नहीं ली।
ग्रामीणों का कहना है कि अब हमसे एक बार गलती हो चुकी है, लेकिन आने वाले समय में जो भी चुनाव होंगे, हम राजनेताओं को स्पष्ट रूप से बता देंगे कि हम अब और झूठे वादे नहीं सुनेंगे। जब हमारी मूलभूत जरूरतें ही पूरी नहीं होंगी, तो वोट देने का कोई औचित्य नहीं बचता है।
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