विदिशा में जान जोखिम में डालकर स्कूल जा रहे 10 बच्चे, ऊफनती बेतवा नदी के स्टॉप डैम को पार करने की मजबूरी
विदिशा में बरसात के मौसम में बच्चे जान जोखिम में डालकर ऊफनती बेतवा नदी का स्टॉप डैम पार कर स्कूल जा रहे हैं। 5 किमी का लंबा रास्ता बचाने के लिए बच्चे यह खतरनाक शॉर्टकट अपना रहे हैं।
विदिशा: मध्य प्रदेश में बारिश का मौसम आते ही प्रदेश के कई हिस्सों से ऐसी दर्दनाक और हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आने लगती हैं, जो रोंगटे खड़े कर देती हैं। कहीं सड़क न होने तो कहीं पुल के अभाव में ग्रामीण और स्कूली बच्चों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी तरह का एक चिंताजनक मामला विदिशा जिले से सामने आया है, लेकिन यहाँ की हकीकत थोड़ी अलग है। बताया जा रहा है कि विदिशा में लगभग 10 बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल जल्दी पहुँचने के चक्कर में अपनी जिंदगी को सीधे तौर पर खतरे में डाल रहे हैं, क्योंकि मुख्य सड़क से जाने पर उन्हें 5 किलोमीटर का लंबा चक्कर काटना पड़ता है, जिसके चलते ये बच्चे उफनती बेतवा नदी पर बने जर्जर स्टॉप डैम को पार करके स्कूल पहुँच रहे हैं।
⚠️ स्टॉप डैम के खतरनाक 4 फीट गैप को कूदकर पार करते हैं मासूम
विदिशा जिला मुख्यालय के पास स्थित ककरुआ गांव में सिर्फ आठवीं कक्षा तक ही स्कूल है, जिसके बाद आगे की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए बच्चों को पलोह हाईस्कूल जाना पड़ता है।
शासन की ओर से साइकिल मिलने के बावजूद कुछ बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर इस जानलेवा रास्ते से स्कूल जा रहे हैं। आपको यह जानकर भारी हैरानी होगी कि मुख्य पक्की सड़क से जाने पर बच्चों को सिर्फ 5 किलोमीटर का थोड़ा लंबा रास्ता तय करना पड़ता है, लेकिन स्कूल पहुँचने की जल्दबाजी और शॉर्टकट अपनाने की आदत के कारण वे बेहद खतरनाक रास्ता चुन लेते हैं।
ये छात्र उफनती बेतवा नदी पर बने स्टॉप डैम के खतरनाक 4 फीट के चौड़े गैप को कूदकर पार करते हैं। छात्र लगभग 10 खंभों पर कूदते हुए आगे बढ़ते हैं, जिनके बीच में बहुत बड़ा गैप होता है और वहाँ पानी की तेज व मोटी धार बह रही होती है। मानसून सीजन में तो इन खंभों पर भयंकर फिसलन भी बनी रहती है, और जरा सा भी संतुलन बिगड़ने पर पैर फिसलना सीधे तौर पर जिंदगी पर भारी पड़ सकता है। जानकारी के अनुसार ये छात्र बंधेरा, ककरुआ, इमलिया और बेहलोट गांवों के रहने वाले हैं, जिनमें कुल 10 छात्र-छात्राएं (6 लड़के और 4 लड़कियां) शामिल हैं।
🌉 पक्का पुल बनाने या स्कूल के अपग्रेडेशन की उठी मांग
इस पूरी स्थिति की गंभीरता को स्वीकार करते हुए विदिशा के एसडीएम क्षितिज शर्मा ने बताया कि सुरक्षा के लिहाज से प्रशासन ने स्टॉप डैम के इस खतरनाक रास्ते पर कटीली झाड़ियां और तार लगाकर फिलहाल आवाजाही बंद करा दी है, जिससे कई बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं।
दूसरी ओर, स्थानीय ग्रामीणों ने पुरजोर मांग की है कि या तो इस स्टॉप डैम पर तत्काल एक पक्का पुल बनाया जाए या फिर बंधेरा के प्राथमिक स्कूल को अपग्रेड करके उसे हाई स्कूल में बदला जाए। इस पर शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन ने स्कूल के अपग्रेडेशन की प्रक्रिया जारी होने की बात कही है।
🗣️ 'पिछले 5-6 सालों से यही स्थिति बनी हुई है'—छात्र का दर्द
इस मामले पर बात करते हुए एक ग्रामीण छात्र ने बताया कि, "मैंने दो साल शासकीय हाई स्कूल पलोह में पढ़ाई की है। मैं हमेशा नदी के खतरनाक रास्ते से ही स्कूल जाता था और मेरे साथ अन्य बच्चे भी जाते थे। पिछले 5-6 वर्षों से लगातार यही स्थिति बनी हुई है।"
उसने आगे कहा कि हर बार बारिश के इन चार महीनों में नदी के उफान पर रहने और डैम टूटे होने के कारण कई बच्चे स्कूल पहुँच ही नहीं पाते, जिससे उनकी पढ़ाई का नुकसान होता है। अगर वे इन चार महीनों में भी नियमित रूप से स्कूल जा पाते, तो उनके परीक्षा परिणाम और अधिक बेहतर आ सकते थे।
🚲 साइकिल मिलने के बावजूद बच्चे क्यों उठा रहे हैं जोखिम?
विस्तार से जानकारी देते हुए विदिशा के एसडीएम क्षितिज शर्मा ने बताया कि संबंधित स्कूल में कुल 70 बच्चे पढ़ाई करते हैं। कुछेक छात्रों को छोड़कर बाकी के सभी स्टूडेंट्स रोज सरकार द्वारा दी गई साइकिलों से ही मुख्य पक्के रास्ते से स्कूल आते हैं, लेकिन करीब 10 ऐसे बच्चे हैं जो नियमों को ताक पर रखकर स्टॉप डैम से फांदकर आना चाहते हैं।
प्रशासन ने पहले ही वादा किया है कि वह इसका जल्द से जल्द स्थायी बंदोबस्त करेगा। स्टॉप डैम पर स्लैब डालने का काम और सुरक्षा की दृष्टि से वहाँ पटवारी व होमगार्ड के जवानों की तैनाती भी कर दी गई है।
SDM ने आगे स्पष्ट किया कि स्कूल पहुँचने के लिए एक पक्का, सुरक्षित और बेहतरीन रास्ता पहले से ही पूरी तरह तैयार है, लेकिन कुछ चुनिंदा बच्चे ही शॉर्टकट के चक्कर में डैम से गुजर रहे हैं। सरकार की तरफ से गाँवों के बच्चों को इसी आवागमन की परेशानी के चलते मुफ्त साइकिलें मुहैया कराई गई हैं। इसके अलावा प्रशासन ने अभिभावकों को यह विकल्प भी ऑफर किया है कि यदि वे 5 किलोमीटर दूर इस स्कूल की बजाय जिला मुख्यालय विदिशा में अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, तो उनका एडमिशन वहाँ कराया जा सकता है। आपको बता दें कि ग्रामीण क्षेत्र से विदिशा शहर की दूरी करीब 8 किलोमीटर है, जबकि वर्तमान स्कूल की दूरी 5 किलोमीटर है।
📏 शॉर्टकट अपनाने से बचती है रोजाना কয়েক किलोमीटर की दूरी
ग्रामीणों के बच्चों के लिए डैम पार कर स्कूल जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण केवल दूरी का कम होना है।
स्टॉप डैम से होकर जाने पर एक तरफ का रास्ता महज डेढ़ से दो किलोमीटर के आसपास का पड़ता है, यानी दोनों तरफ का चक्कर मिलाकर रोजाना केवल 3 से 4 किलोमीटर ही आना-जाना होता है। इसके विपरीत, साइकिल से मुख्य पक्के रास्ते से आने-जाने में प्रतिदिन करीब 10 किलोमीटर का लंबा चक्कर काटना पड़ता है।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि पिछले वर्षों में इस रास्ते से महज 2 या 3 बच्चे ही हाईस्कूल आते-जाते थे, लेकिन इस साल इस मार्ग से लगभग 10 बच्चों ने एडमिशन लिया है, जिसके चलते यह जोखिम भरा मामला अब खुलकर सामने आया है।
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