सावन में गूंजे ओंकारेश्वर के जयकारे, जानिए चौथे ज्योतिर्लिंग और ममलेश्वर मंदिर का पौराणिक इतिहास
खंडवा जिले में स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग देश के 12 प्रमुख शिवधामों में शामिल है। सावन के महीने में यहाँ दोनों रूपों (ओंकारेश्वर और ममलेश्वर) के दर्शन का विशेष महत्व है।
खंडवा: पवित्र सावन महीने की शुरुआत होते ही देश के सभी मंदिरों और शिवालयों में शिव भक्तों की भारी भीड़ उमड़नी शुरू हो गई है। हिंदू धर्म और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देश के अलग-अलग हिस्सों में कुल 12 पावन ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं, जिनमें से 2 अकेले मध्य प्रदेश में ही स्थित हैं। इन दोनों ही प्रसिद्ध महातीर्थों में 'बम-बम भोले' के गगनभेदी जयकारों के साथ श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया है। अगर बात खंडवा जिले में स्थित प्रसिद्ध ओंकारेश्वर मंदिर की की जाए, तो यहाँ की अनोखी धार्मिक मान्यता इसे बाकी सभी ज्योतिर्लिंगों से बिल्कुल अलग और खास बनाती है। आइए जानते हैं ओंकारेश्वर नाम के पीछे की पौराणिक कहानी और इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व के बारे में।
🛕 दोनों रूपों के दर्शन के बिना अधूरा माना जाता है ज्योतिर्लिंग का यह पावन सफर
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में स्थित ओंकारेश्वर चौथे स्थान पर आता है। यह पवित्र स्थल इंदौर शहर से लगभग 77 किलोमीटर की दूरी पर नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है।
ओंकारेश्वर मंदिर की सबसे पहली और सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ नर्मदा नदी के उत्तर तट पर भगवान ओंकारेश्वर और दक्षिण तट पर भगवान ममलेश्वर (ममनाथ) विराजमान हैं। ऐसी अटूट मान्यता है कि कोई भी श्रद्धालु जब तक इन दोनों स्वरूपों के दर्शन नहीं कर लेता, तब तक उसकी यह तीर्थयात्रा पूरी नहीं मानी जाती है। यानी भगवान ओंकारेश्वर और भगवान ममलेश्वर—दोनों के दर्शन करने के बाद ही संपूर्ण ज्योतिर्लिंग के दर्शन का वास्तविक पुण्य फल प्राप्त होता है।
🕉️ ऊपर से देखने पर नजर आता है ॐ का आकार, यहीं विश्राम करते हैं भोलेनाथ
इस पूरे क्षेत्र को यदि आसमान या ऊपर से देखा जाए, तो इसकी भौगोलिक बनावट बिल्कुल 'ॐ' के आकार की नजर आती है। 'ओंकारेश्वर' नाम का शाब्दिक अर्थ ॐ या ओंकार से ही जुड़ा हुआ है।
शिवपुराण के मुताबिक, एक समय ऐसा आया था जब भगवान शिव यहाँ प्रकट हुए थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव प्रतिदिन तीनों लोकों का ब्रह्मांडीय चक्कर लगाने के बाद विश्राम करने के लिए इसी स्थान पर आते थे। ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार देवर्षि नारद ने विंध्य पर्वत के अहंकार को थोड़ा कम करने के लिए उसकी तुलना मेरु पर्वत से कर दी थी, जो बात विंध्य पर्वत को बिल्कुल रास नहीं आई।
⛰️ विंध्य पर्वत की तपस्या और भगवान शिव का दो रूपों में प्रकट होना
इसके बाद विंध्य पर्वत ने भगवान शिव को प्रसन्न करने और अपनी महत्ता साबित करने के लिए बेहद कठिन और कठोर तपस्या की।
विंध्य पर्वत की सच्ची तपस्या और अटूट भक्ति को देखकर भोलेनाथ अति प्रसन्न हुए और उसे मनोवांछित वरदान दे दिया। हालांकि, भगवान शिव को यह भी अंदेशा हुआ कि दी गई शक्ति का कहीं दुरुपयोग न हो जाए, इसलिए संतुलन बनाए रखने के लिए उन्होंने खुद को दो अलग-अलग रूपों में विभाजित कर लिया। ये दोनों रूप ओंकारेश्वर और ममलेश्वर कहलाए, जिसमें ओंकारेश्वर एक तरफ शिवलिंग के रूप में और ममलेश्वर नर्मदा नदी के दूसरी तरफ स्थापित हुए। ऐसा करके भगवान शिव ने विंध्य पर्वत पर निरंतर अपनी नजर रखना भी सुनिश्चित किया।
⚔️ राजा मांधाता की तपस्या और राक्षसों पर भगवान शिव की विजय
लोकमान्य मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम के महान पूर्वज राजा मांधाता ने इसी पावन भूमि पर कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं उनके सामने प्रकट हुए थे।
राजा मांधाता के ही विशेष आग्रह पर भोलेनाथ इसी स्थान पर हमेशा के लिए ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए, और तभी से यह स्थल देश के अग्रणी शिवधामों में शुमार हो गया। इसके अलावा, एक अन्य कथा यह भी कहती है कि प्राचीन काल में जब देवताओं और राक्षसों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था, तब राक्षस देवताओं पर भारी पड़ रहे थे। उस संकट के समय सभी देवी-देवताओं ने मिलकर भगवान शिव की आराधना की, जिसके बाद भोलेनाथ ने ओंकारेश्वर के रूप में प्रकट होकर समस्त राक्षसों का संहार किया था। इस तरह की तमाम पावन किंवदंतियां ओंकारेश्वर मंदिर से जुड़ी हुई हैं।
🏛️ परमार राजवंश के काल में हुआ था मंदिर का निर्माण
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि यह लगभग 11वीं शताब्दी का प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण मध्य भारत के प्रतापी मालवा के परमार राजाओं द्वारा करवाया गया था।
हालाँकि, 13वीं शताब्दी के दौरान कुछ विदेशी आक्रांताओं ने इस ऐतिहासिक मंदिर पर आक्रमण भी किया था, जिससे मंदिर के कुछ हिस्सों को काफी क्षति पहुँची थी, लेकिन भगवान की कृपा से मुख्य ज्योतिर्लिंग और मंदिर के गर्भ गृह को कोई नुकसान नहीं हुआ। इस प्रकार ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की अपनी एक बेहद गौरवशाली और अनूठी मान्यता है।
सावन के इस पवित्र महीने में ओंकारेश्वर मंदिर के कपाट रोज की तरह तड़के सुबह लगभग 4 बजे ही खोल दिए जाते हैं। मंगला आरती के बाद से ही आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शनों का सिलसिला शुरू हो जाता है। सावन का पहला सोमवार होने के कारण यहाँ दूर-दूर तक भक्तों की लंबी-लंबी कतारें लगी रहीं, और देश भर से पहुँचे कांवड़ियों ने नर्मदा जल से भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक किया। श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुगम दर्शन के लिए स्थानीय प्रशासन द्वारा लगभग 300 पुलिस कर्मियों को तैनात किया गया है।
🌿 श्रावण मास: शिव आराधना और साधना का सबसे पवित्र महीना
हिंदू पंचांग के अनुसार, श्रावण मास को देवों के देव महादेव की आराधना करने का सबसे उत्तम और पवित्र समय माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे पवित्र महीने में भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती के साथ धरती लोक पर विचरण करने के लिए आते हैं। यही मुख्य कारण है कि सावन के प्रत्येक सोमवार का अपना एक विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है, और भक्तजन पूरे श्रद्धा भाव से व्रत रखकर, विधि-विधान से पूजा और जलाभिषेक कर भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
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