रियासत कालीन सिद्धनाथ मंदिर में अन्न से ढके जाते हैं शिवलिंग, जानिए इस चमत्कारी जगह की मान्यता
बड़वानी के रानीपुरा स्थित सिद्धनाथ महादेव मंदिर का इतिहास राजाओं के समय से जुड़ा है। यहाँ दो दिव्य शिवलिंग स्थापित हैं और शिवलिंग को अन्न से ढकने की अनोखी परंपरा है।
बड़वानी: रानीपुरा क्षेत्र में स्थित सिद्धनाथ महादेव मंदिर शहर के सबसे प्राचीन, ऐतिहासिक और लोगों की अगाध आस्था के प्रमुख केंद्रों में से एक माना जाता है। इस मंदिर का इतिहास इतना पुराना और गौरवशाली है कि इसकी मूल स्थापना कब हुई थी, इसका सटीक लिखित उल्लेख या जानकारी आज किसी के पास उपलब्ध नहीं है। इस मंदिर से जुड़ी प्राचीन मान्यताओं और अनूठी धार्मिक परंपराओं के चलते यहाँ प्रतिदिन दूर-दूर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन और पूजन के लिए पहुँचते हैं।
👑 रियासत काल से राजपरिवार के संरक्षण में रहा है यह ऐतिहासिक मंदिर
इस मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी देते हुए मंदिर के पुजारी पंडित शैलेन्द्र तिवारी बताते हैं कि, "उनके पिता भी वर्षों से इस पवित्र मंदिर में लगातार पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं।" उन्होंने बताया कि सिद्धनाथ महादेव मंदिर का सीधा संबंध प्राचीन राजाओं के काल से रहा है।
बड़वानी रियासत के राजा रणजीत सिंह के समय से ही यह मंदिर लगातार राजपरिवार के संरक्षण में रहा है। आज भी इस मंदिर का दैनिक संचालन और रखरखाव उसी पुरानी ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार ही किया जाता है। इस प्राचीन मंदिर की सबसे बड़ी और अनोखी विशेषता यहाँ मुख्य गर्भ गृह में स्थापित दो पावन शिवलिंगों का होना है। ऐसी मान्यता है कि इनमें से एक शिवलिंग 'स्वयंभू' है, जो जमीन से स्वयं प्रकट हुआ था, जबकि दूसरा शिवलिंग उड़कर इस स्थान पर आया था।
🔱 भगवान हरि और हर (विष्णु और शिव) के प्रतीक माने जाते हैं दोनों शिवलिंग
प्राचीन काल में विद्वानों और संतों ने उस दूसरे शिवलिंग की दिव्य ऊर्जा को पहचानकर उसे इसी स्थान पर ससम्मान स्थापित कर दिया था, ताकि उसकी दिव्यता सुरक्षित रहे और उसका कोई दुरुपयोग न हो सके।
यही प्रमुख कारण है कि इस मंदिर को क्षेत्र का अत्यंत सिद्ध, जाग्रत एवं चमत्कारी स्थल माना जाता है। पंडित जी ने बताया कि मंदिर में विराजमान दोनों शिवलिंगों को 'हरि' और 'हर' का जीवंत प्रतीक माना जाता है। इनमें से एक शिवलिंग भगवान विष्णु (हरि) का स्वरूप और दूसरा भगवान शिव (हर) का स्वरूप माना जाता है। इसी अद्भुत और दिव्य मिलन के कारण इस पवित्र स्थान को 'सिद्धनाथ महादेव मंदिर' के नाम से जाना जाता है। श्रद्धालुओं की अटूट मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहाँ आता है, उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं और उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
🌾 मनोकामना पूर्ति के लिए शिवलिंग को अन्न से ढकने की अनोखी परंपरा
इस मंदिर की एक और सबसे विशेष और दुर्लभ परंपरा भगवान शिव के शिवलिंग को तरह-तरह के अन्न से ढकने की है।
यहाँ आने वाले श्रद्धालु अपनी विशेष श्रद्धा, मन्नत और अपने जन्मकुंडली के ग्रह-नक्षत्रों की शांति के लिए शिवलिंग को धान (चावल), गेहूं, चना, ज्वार, शक्कर व अन्य अनाजों से ढंककर पूजा करते हैं। ऐसी प्राचीन मान्यता है कि जिन लोगों के ग्रह-नक्षत्र अशुभ या भारी चल रहे हों, वे यदि यहाँ पूरी श्रद्धा से यह विशेष अनुष्ठान करें, तो उनके जीवन की तमाम बाधाएं हमेशा के लिए दूर हो जाती हैं और उन्हें जीवन में सुख-समृद्धि तथा शांति की प्राप्ति होती है।
🔥 राजाओं के समय से निरंतर प्रज्वलित है सिद्धनाथ मंदिर की अखंड ज्योति
सिद्धनाथ महादेव मंदिर के अंदर रियासतकाल यानी राजाओं के समय से ही एक 'अखंड ज्योति' लगातार प्रज्वलित चली आ रही है, जो आज भी बिना किसी बाधा के लगातार जल रही है।
यह अखंड ज्योति इस मंदिर की प्राचीन परंपरा, आध्यात्मिक ऊर्जा और अटूट आस्था का एक जीवंत प्रतीक मानी जाती है। पंडित शैलेन्द्र तिवारी ने बताया कि इस मंदिर में हर दिन भगवान शिव की आराधना के लिए महामृत्युंजय मंत्र सहित अनेक वैदिक मंत्रों का सस्वर पाठ और जाप किया जाता है। ऐसी दृढ़ मान्यता है कि यहाँ विधि-विधान से मंत्र जाप या अनुष्ठान कराने से गंभीर रोगों से पीड़ित लोगों को भी विशेष लाभ मिलता है और देवाधिदेव महादेव की कृपा से उनके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। दूर-दराज से श्रद्धालु अपने परिवार के स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और विशेष मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए यहाँ अनुष्ठान कराने पहुँचते हैं।
🎉 सावन मास और शिवरात्रि पर उमड़ता है श्रद्धालुओं का भारी सैलाब
पवित्र सावन मास, महाशिवरात्रि और अन्य बड़े धार्मिक पर्वों व उत्सवों के दौरान सिद्धनाथ महादेव मंदिर में आसपास के ग्रामीण और शहरी इलाकों से आने वाले श्रद्धालुओं का विशेष सैलाब उमड़ता है।
स्थानीय नागरिकों के अनुसार, यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना और माथा टेकने भर का स्थान नहीं है, बल्कि यह बड़वानी शहर की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक धरोहर और सनातन धर्म की गहरी आस्था का एक जीवंत प्रतीक है।
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